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एक तरफ रणनीति के धुरंधर गौतम गंभीर जो अपने बेबाक अंदाज और तीखी सोच के लिए जाने जाते हैं. दूसरी तरफ शांत स्वभाव वाले कप्तान सूर्याकुमार यादव, जिनका बल्ला बोलता है और जो अक्सर शब्दों से ज्यादा अपने खेल से जवाब देते हैं. दोनों की शख्सियत भले ही अलग-अलग हो, लेकिन उनका लक्ष्य एक ही है – भारत को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टी20 टीम बनाना
जीत के लिए सूर्या का समीकरण और गंभीर के गेम प्लान को करना होगा एक साथ काम
नई दिल्ली. मुंबई की रात, वानखेड़े का मंच और इतिहास से बस दो कदम की दूरी. एक तरफ रणनीति के धुरंधर गौतम गंभीर जो अपने बेबाक अंदाज और तीखी सोच के लिए जाने जाते हैं. दूसरी तरफ शांत स्वभाव वाले कप्तान सूर्याकुमार यादव, जिनका बल्ला बोलता है और जो अक्सर शब्दों से ज्यादा अपने खेल से जवाब देते हैं. दोनों की शख्सियत भले ही अलग-अलग हो, लेकिन उनका लक्ष्य एक ही है – भारत को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टी20 टीम बनाना और विश्व कप खिताब का सफलतापूर्वक बचाव करना. इतिहास रचना और ऐसी विरासत छोड़ना, जो आने वाली पीढ़ियों के क्रिकेटरों को प्रेरित करे.आज मुंबई में होने वाला सेमीफाइनल उस मिशन की सबसे अहम सीढ़ियों में से एक है.
सबसे पहले बात गौतम गंभीर की. साल 2011 में श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप फाइनल के दौरान भारत मुश्किल में था. वीरेंद्र सहवाग और सचिन तेंदुलकर जल्दी आउट होकर पवेलियन लौट चुके थे. क्रीज पर आए विराट लेकिन वह तब वह विराट नहीं थे जिन्हें दुनिया ने 2016 से 2018 के बीच देखा. ऐसे में जब विश्व कप दांव पर था, तब जिम्मेदारी संभालने के लिए गंभीर को आगे आना पड़ा. उन्होंने मोर्चा संभाला, पारी को थामा और उदाहरण पेश करते हुए टीम को संभाला. उन्होंने शतक भले ही नहीं बनाया, लेकिन उनकी 97 रन की पारी विश्व कप फाइनल की सबसे प्रभावशाली पारियों में हमेशा गिनी जाएगी. उन्होंने दबाव को अपने ऊपर लिया और मंच तैयार किया, ताकि महेंद्र सिंह धोनी अपनी यादगार फिनिश दे सकें.
गंभीर का वानखेड़े कनेक्शन
गंभीर की तरह ही उनकी पारी भी चमकदार शोपीस नहीं थी, लेकिन भारत की जीत की कहानी में वह सबसे अहम वास्तुकारों में से एक थे. गंभीर अक्सर छोटी-छोटी योगदानों के महत्व की बात करते हैं. श्रीलंका के खिलाफ उनकी 97 रन की पारी छोटी तो बिल्कुल नहीं थी, लेकिन सच यह भी है कि वह अक्सर धोनी के उस विजयी छक्के के आगे दब जाती है. फिर भी वह पारी निर्णायक थी विश्व खिताब और हार के बीच का फर्क.आज उसी मैदान पर वह अपने खिलाड़ियों को यही याद दिला सकते हैं कि मुश्किल हालात में भी मैच खत्म नहीं होता. उस दिन सहवाग और सचिन का बड़ा योगदान नहीं था, फिर भी भारत जीता. इसलिए आज किसी एक खिलाड़ी की नहीं, पूरी टीम के सामूहिक प्रदर्शन की जरूरत है.
अपने मैदान पर कप्तान का बड़ा इम्तिहान
अब बात कप्तान सूर्याकुमार यादव की. मुंबई उनका घरेलू मैदान है वह जगह जहां उन्होंने अपने करियर में लगभग सौ टी20 मैच खेले हैं. इस मैदान की हर घास, हर एंगल से वह परिचित हैं. आज उनके सामने इतिहास रचने का मौका भी है. यह विश्व कप शायद उनके लिए या भारत के लिए अब तक पूरी तरह परफेक्ट नहीं रहा, लेकिन टीम वहां खड़ी है जहां सबसे ज्यादा मायने होता है. कप्तान के तौर पर सूर्या के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी शांत रहना और अपनी टीम को भी शांत रखना. सेमीफाइनल में ऐसे कई पल आएंगे जो उन्हें परखेंगे, उन पर सवाल उठाएंगे और दबाव बनाएंगे. उन्हें उन सवालों के जवाब ढूंढने होंगे और इस चुनौती का आनंद भी लेना होगा. कहा जाता है कि दबाव एक विशेषाधिकार होता है. और भारत की कप्तानी करते हुए विश्व कप सेमीफाइनल खेलना ऐसा सम्मान है जो दुनिया के 0.1 प्रतिशत क्रिकेटरों को भी नसीब नहीं होता.
अगर कप्तान और कोच इस मौके का आनंद ले पाए, तो पूरी टीम उनके साथ उसी लय में बहने लगेगी. और अगर ऐसा हुआ, तो भारत को फाइनल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकेगा.