ये है मां का हौसला! जब गांव की पहली मैट्रिक पास लड़की के सपने टूटे, तब बच्चों को बनाया अफसर

ये है मां का हौसला! जब गांव की पहली मैट्रिक पास लड़की के सपने टूटे, तब बच्चों को बनाया अफसर


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Women’s Day Story: यह कहानी आशा सोनेकर की है, जिनका जन्म एक शिक्षित परिवार में हुआ. बालाघाट के छोटे से गांव बम्हनी में पढ़ीं और बड़ी हुई. उनके पढ़ने पर बुजुर्ग ताने मारते थे. कड़े संघर्ष के बाद मैट्रिक पास किया, लेकिन पढ़ाई छूट गई. फिर उन्होंने जो किया, वो महिलाओं के लिए मिसाल से कम नहीं.

Balaghat News: यह कहानी हर उस भारतीय महिला से जुड़ी है, जिनके सपने रूढ़िवादी परंपराओं के बोझ तले दब कर रह गए. फिर उन्होंने संघर्षों से भरी जिंदगी में अपने सपनों को बच्चों के रूप में पूरा किया. उन्हें अफसर बनाया. कुछ ऐसी ही कहानी बालाघाट की आशा सोनकर की है. 1965 में आशा सोनेकर का जन्म एक शिक्षित परिवार में हुआ था. पिता उस जमाने में पटवारी थे. आश बालाघाट के छोटे से गांव बम्हनी में पढ़ी और बड़ी हुईं. उनके पढ़ने पर बुजुर्ग ताने दिया करते थे. लेकिन, पढ़ाई की ऐसी जिद की वह बड़े भाई से भी होनहार थी. लेकिन, सिर्फ लड़की होने के चलते अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं.

गांव की पहली लड़की, जो मैट्रिक पास 
आशा बचपन से ही पढ़ने में तेज थीं. शुरुआत की पढ़ाई तो गांव में ही हुई, लेकिन जब 9वीं में पढ़ने का समय आया तो परिवार सहमत न था. गांव से महज चार किलोमीटर दूर लालबर्रा में हायर सेकेंडरी स्कूल था. पढ़ने के जुनून के चलते वह पढ़ने गईं. जंगल का कच्चा रास्ता था और गांव की इकलौती बिटिया पढ़ने के लिए पैदल स्कूल जाती थी. कभी बारिश होती तो नाले में पानी आ जाता था. फिर भी बाढ़ में नाला पार कर स्कूल जाती और दिन भर भीगी रह जाती थी. एक नाविक था, जो बच्चों को नाव से नाला पार कराता था. वहीं, बारिश ज्यादा होती और नाला से आना मुश्किल होता तो कई किलोमीटर पैदल चल कर वह घर आती थी. संघर्ष किया, आगे बढ़ीं और हायर सेकेंडरी की पढ़ाई भी पूरी कर ली. ये मुकाम हासिल करने वाली आशा गांव की पहली लड़की बनीं. आंखों में सपने थे कि साइंस से ग्रेजुएशन कर डॉक्टर की पढ़ाई करें लेकिन रूढ़िवादी परंपराओं के चल वह सपने ही रह गए.

शादी हुई और मिली जिम्मेदारी
आशा की शादी करीब 24 साल की उम्र हुई. शहर का नामी गिरामी और ससुर राजनीति से ताल्लुक रखते थे. एक संयुक्त परिवार, जिनकी सेवा में पूरा दिन गुजर जाता था. इस बीच भी टीचर बनने का एक मौका मिला, लेकिन फिर बीच में आ गई रूढ़ीवादी परंपराएं. इन जिम्मेदारियों के बीच फिर वह अपनी गृहस्थी में जूट गईं. लेकिन, अपने अधूरे सपनों को बच्चों में देखने लगीं.

परिवार संग बच्चों को संभाला
एक तरफ परिवार की जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ बच्चों की. उनके बच्चे भी बचपन से ही पढ़ने में तेज थे. ऐसे में वह अपने बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए पहले घर का काम करतीं, फिर बच्चों को गोद में लेकर पढ़ाती थी. उनकी ये मेहनत रंग लाई और उनके बच्चों ने उनके देखे हुए सपनों को पूरा किया. उनकी बेटी  माधुरी सोनेकर अब सांची दुग्ध संघ में जिला प्रबंधक के तौर पर काम कर रही है. बेटा सागर सोनेकर  रेलवे में सेक्शन ऑफिसर है. आज आशा भले ही किसी दफ्तर में अफसर नहीं हैं, लेकिन वह उस दीपक की तरह हैं, जिसने खुद जलकर अपने बच्चों को सूरज सी चमक दी है.

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Rishi mishra

एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें

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