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Women’s Day 2026: सीधी जिले की गुड्डू रावत कभी आर्थिक तंगी के कारण खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करती थीं. करीब 10 साल पहले वे दिनभर मेहनत के बदले 4 किलो गेहूं मिलता था. बाद में हथकरघा प्रशिक्षण से जुड़कर उन्होंने कपड़ा बुनना सीखा. आज वे इसी हुनर से हर महीने 14-15 हजार रुपये कमा रही हैं और 150 से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं.
Women’s Day 2026: समय के साथ समाज की सोच जरूर बदल रही है, लेकिन आज भी कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं के लिए जीवन आसान नहीं है. मध्य प्रदेश के सीधी जिले में भी कई महिलाएं आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं. हालांकि, इन्हीं परिस्थितियों के बीच कुछ महिलाएं अपने हौसले और मेहनत से नई मिसाल कायम कर रही हैं. ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी रामपुर नैकिन के भरतपुर गांव की गुड्डू रावत की है, जिन्होंने मजदूरी से शुरुआत कर आज हथकरघा के जरिए आत्मनिर्भरता की नई पहचान बनाई है.
गुड्डू रावत ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि उनकी शादी महज 14 साल की उम्र में हो गई थी. कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं. उनके पति ट्रक ड्राइवर हैं, लेकिन सीमित आमदनी के कारण घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था. ऐसे में गुड्डू ने भी परिवार की मदद के लिए खेतों में मजदूरी करना शुरू कर दिया. वह बताती हैं कि कई बार पूरे दिन खेतों में कड़ी मेहनत करने के बाद मजदूरी के रूप में सिर्फ 4 किलो गेहूं ही मिल पाता था. इतनी कम आमदनी में परिवार की जरूरतें पूरी करना बेहद कठिन था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बेहतर जीवन की तलाश जारी रखी.
इसी दौरान भरतपुर गांव में आजीविका मिशन के तहत हथकरघा और दस्तकारी सहकारी समिति की शुरुआत हुई. समिति प्रबंधक शैलेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में गुड्डू रावत इस समिति से जुड़ गईं. यहां उन्हें हथकरघा से कपड़ा बुनने का प्रशिक्षण दिया गया. शुरुआत में उन्होंने सामान्य धागों से कपड़ा बनाना सीखा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस काम में महारत हासिल कर ली. अब वे महीन धागों से सुंदर और टिकाऊ कपड़े तैयार करती हैं.
हथकरघा एक पारंपरिक कला
समिति प्रबंधक शैलेंद्र सिंह ने बताया कि हथकरघा एक पारंपरिक कला है, जिसमें बिना बिजली के हाथों से करघे पर धागों को पिरोकर कपड़ा तैयार किया जाता है. गुड्डू ने इस कला को इतनी लगन और मेहनत से सीखा कि आज वे कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. वर्तमान में गुड्डू रावत भरतपुर हथकरघा केंद्र में करीब 150 महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं. यहां लकड़ी के फ्रेम से बनी मशीनों पर महिलाएं हाथों से कपड़ा बुनती हैं और उस पर आकर्षक डिजाइन तैयार करती हैं. एक बुनकर प्रतिदिन लगभग 9 से 10 मीटर कपड़ा तैयार कर लेता है, जिससे उसे 500 से 600 रुपये तक की आमदनी हो जाती है.
गुड्डू रावत की मासिक आय अब 14 से 15 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है. उनके द्वारा तैयार किए गए शुद्ध कॉटन के कपड़ों की मांग अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. भोपाल, दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी इन उत्पादों की अच्छी मांग है. पिछले साल दिल्ली में आयोजित एक मेले में भी महिलाओं ने अपने उत्पादों का स्टॉल लगाया था, जहां ग्राहकों ने इनकी गुणवत्ता और डिजाइन की खूब सराहना की. यहां तैयार शॉल 400 से 600 रुपये और डबल बेडशीट 300 से 500 रुपये तक बिकती है. खास बात यह है कि इन कपड़ों को कई बार धोने के बाद भी इनका रंग फीका नहीं पड़ता और धागे भी नहीं निकलते. गुड्डू रावत की कहानी बताती है कि अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिल जाए तो ग्रामीण महिलाएं भी अपने हुनर से अपनी जिंदगी बदल सकती हैं. महिला दिवस के मौके पर उनकी यह सफलता कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है और यह संदेश देती है कि मेहनत और हौसले से हर सपना पूरा किया जा सकता है.
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Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें