कुछ वर्ष पहले तक सुबह से शाम तक ट्रेन के हॉर्न और लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले रेलवे स्टेशन अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं। हम बात कर रहे हैं ग्वालियर-श्योपुर के बीच बंद हुई देश की सबसे पतली नैरोगेज ट्रेन के स्टेशनों की। ग्वालियर रेलवे स्टेशन से मुरैना बॉर्डर के रायरू तक 19.21 किलोमीटर में 3 स्टेशनों पर इस ट्रेन का स्टॉपेज होता था। ये स्टेशन घोसीपुरा, मोतीझील और मिलावली हैं। 2020 में ट्रेन बंद होने के बाद ये तीनों स्टेशन जर्जर हालत में पहुंच गए हैं। रेलवे प्रबंधन अपनी इन संपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहा। इस कारण इन स्टेशनों पर नशेड़ी एवं जुआरियों का अड्डे बन गए हैं। कुछ में लोगों ने कब्जा कर रहना भी शुरू कर दिया है। रेलवे स्टेशन शुरुआत: 1904 में शुरू हुई, इस पर 28 स्टेशन थे नैरोगेज के प्लेटफार्म पर शराबखोरी, तीन थाने फिर भी कार्रवाई नहीं
रेलवे स्टेशन पर नैरोगेज का प्लेटफार्म अब वीरान है। इसके पास ही शराब दुकान है और दिन-रात इसके प्लेटफार्म पर ही शराबखोरी करते हैं। आरपीएफ, जीआरपी और पड़ाव थाना पुलिस तीनों में से कोई भी यहां धरपकड़ नहीं करती। जिससे इन नशेड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जो आए दिन लूट को भी अंजाम देते हैं।
घोसीपुरा स्टेशन खूबी: देश की सबसे पतली और लंबी 200 किमी लाइन जहां से बीजेपी ने शुरू किया अभियान उस स्टेशन पर दिनभर चलता है जुआ
यह स्टेशन बहोड़ापुर, विनय नगर और जीवाजीगंज जैसी घनी आबादी को जोड़ता है। यह पहले गुलजार रहता था, लेकिन अब वीरान होकर जर्जर हो गया है। आसपास के लोग जुआ खेलते दिखाई देते हैं। यहीं से मप्र विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने नैरोगेज ट्रैक को ब्रॉडगेज में बदलने का अभियान शुरू किया था। मोतीझील स्टेशन बंद: कोरानाकाल में वर्ष 2020 में इसे बंद किया
ट्रैक बंद होने से कर्मचारी भी हट गए, उनके क्वार्टर में जुआ खिलाते हैं लोग
ग्वालियर का दूसरा बड़ा स्टेशन था, यहां स्टेशन के साथ कर्मचारी क्वार्टर भी बनाए गए हैं। जिनमें से एक में कोई बाहरी व्यक्ति रह रहा है। स्टेशन और क्वार्टर का ढांचा लगातार जर्जर होता जा रहा है। झाड़ियों से घिरते जा रहे इस स्टेशन की बेंच और ट्रैक पर बैठकर असामाजिक तत्व नशा करने के अलावा जुआ खेलते देखे जा सकते हैं।
मिलावली स्टेशन विकल्प: इसी ट्रैक पर हेरिटेज ट्रेन का था प्रस्ताव स्टेशन को ग्रामीणों ने बनाया तबेला इसमें ही रखते हैं भूसा और कंडे
ग्वालियर-मुरैना बॉर्डर से पहले पड़ने वाले इस स्टेशन की हालत भी बदतर हो चुकी है। यहां बनाए गए स्टेशन भवन, टिकट काउंटर पर स्थाई तौर से तो कोई कब्जा नहीं है। लेकिन आसपास के लोग स्टेशन भवन का उपयोग गाय-भैंस बांधने के लिए करने लगे हैं। साथ ही ये निर्माण जर्जर होकर जगह-जगह से टूटने लगे हैं।
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