रिपोर्टर-आशीष पांडे शिवपुरी
Ancient Shiva Temple: शिवपुरी जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महुआ गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर स्थापित है. इस मंदिर का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किया जाता है. बताया जाता है कि यह मंदिर सातवीं शताब्दी का है और इसकी प्राचीन स्थापत्य कला आज भी लोगों को आकर्षित करती है. मंदिर को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी कई पर्यटक पहुंचते हैं. मंदिर की दीवारों और संरचना पर बनी कलाकृतियां इसकी प्राचीनता को दर्शाती हैं. माना जाता है कि यह मंदिर करीब 1400 साल पुराना है और आज भी क्षेत्र की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पहचाना जाता है.
प्राचीन काल में मधुमती नाम से जाना जाता था महुआ
सातवीं शताब्दी के अंत में निर्मित यह मंदिर स्थापत्य कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है. ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण महुआ गांव में स्थित इस मंदिर का उल्लेख कई प्राचीन अभिलेखों में मिलता है. रणोद से प्राप्त शिलालेख के अनुसार महुआ को पहले मधुमती के नाम से जाना जाता था. उस समय यहां कई प्राचीन मंदिर मौजूद थे, हालांकि समय के साथ उनमें से कई खंडहर में तब्दील हो चुके हैं.
शिलालेखों में मिलता है राजाओं का उल्लेख
इस मंदिर का निर्माण किस शासक ने करवाया, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती. हालांकि महुआ में मिले एक शिलालेख में गुर्जर-प्रतिहार वंश के राजा वत्सराज का उल्लेख मिलता है. ऐतिहासिक अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि सातवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और आठवीं शताब्दी की शुरुआत में त्रिपुरी के कलचुरी शासकों के शासनकाल में महुआ विद्या और शैव धर्म का प्रमुख केंद्र रहा था.
नागर शैली में बना भव्य मंदिर
पूर्व दिशा की ओर मुख किए यह मंदिर नागर शैली की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है. मंदिर एक निचले चबूतरे पर बना हुआ है और इसे पंचरथ शैली में निर्मित किया गया है. इसमें मुख मंडप, अंतराल और गर्भगृह की संरचना देखने को मिलती है. गर्भगृह के ऊपर बना शिखर बेहद अलंकृत है, जो उस समय की उन्नत शिल्पकला को दर्शाता है.
प्रवेश द्वार पर अद्भुत नक्काशी
मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार इसकी सबसे आकर्षक विशेषताओं में से एक है. इस द्वार पर गंगा और यमुना को उनके-अपने वाहनों के साथ चित्रित किया गया है. इसके अलावा यहां सर्प, नर्तकियों, पत्तियों, फूलों और विभिन्न सजावटी आकृतियों की बारीक नक्काशी भी देखने को मिलती है, जो उस समय की कला और शिल्पकौशल को दर्शाती है.
शिवलिंग स्थापित, बाहर नंदी की टूटी प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है, हालांकि इसके चौखट पर भगवान शिव के स्पष्ट प्रतीक दिखाई नहीं देते, जो एक असामान्य बात मानी जाती है. मंदिर के बाहर नंदी की एक टूटी हुई प्रतिमा भी मौजूद है, जिसे मरम्मत की आवश्यकता बताई जाती है.
एएसआई द्वारा संरक्षित
धरोहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस प्राचीन मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए कई प्रयास किए हैं. इसके बावजूद यह ऐतिहासिक धरोहर अभी भी गुमनामी में है और बहुत कम लोग ही इस प्राचीन मंदिर की अद्भुत कला और स्थापत्य को देखने पहुंचते हैं. यह मंदिर आज भी क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान बना हुआ है.