माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में शनिवार को आयोजित 15वीं वार्षिक भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ की एग्जीक्यूटिव एडिटर जयंती रंगनाथन ने कहा कि पत्रकारिता को कभी भी ग्लैमर के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। यदि इस पेशे में ग्लैमर को अधिक महत्व दिया गया तो सच दबने का खतरा बढ़ जाएगा। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया को राज्य स्तरीय भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया। मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए जयंती रंगनाथन ने कहा कि उन्होंने बैंकिंग की नौकरी छोड़कर रचनात्मक अभिव्यक्ति का रास्ता चुना और टाइम्स स्कूल के माध्यम से पत्रकारिता में कदम रखा। उस दौर में पत्रकारिता पुरुषों का वर्चस्व वाला पेशा था, लेकिन उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिला। उन्होंने बताया कि वे पत्रकारिता में ग्लैमर के लिए नहीं, बल्कि मिशन की भावना से आई थीं और बाद में ‘धर्मयुग’ से जुड़ीं। उन्होंने बताया कि कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज के जेल से फरार होने के बाद तत्कालीन प्रधान संपादक धर्मवीर भारती ने उन्हें उसका इंटरव्यू करने का जिम्मा दिया। इस खबर को कवर करने के लिए वे कुख्यात ‘कबाड़ गली’ तक पहुंचीं, जिससे उन्हें पहचान और सम्मान मिला। रंगनाथन ने कहा कि पत्रकारिता में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। महिला पत्रकारों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे अपनी कमजोरियां या निजी समस्याएं अधिक साझा करती हैं तो सहयोग मिलने में मुश्किल हो सकती है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दौर में इस पेशे में दिखने वाले ग्लैमर ने कई युवतियों को आकर्षित किया है, लेकिन पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज के मुद्दों को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हें महिलाएं अधिक संवेदनशीलता और प्रभाव के साथ कवर कर सकती हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने जेंडर ट्रांजिशन और LGBTQ समुदाय से जुड़ी रिपोर्टिंग का उल्लेख किया। रंगनाथन ने कहा कि महिला पत्रकारों को अक्सर दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि काम का दबाव ज्यादा होता है जबकि आर्थिक पारिश्रमिक अपेक्षाकृत कम मिलता है। उन्होंने कहा कि अब खबरों के लिए केवल अखबार और टीवी पर निर्भरता नहीं रह गई है, डिजिटल माध्यमों ने नई संभावनाएं खोल दी हैं। छोटे शहरों और कस्बों में भी पत्रकारिता तेजी से बढ़ रही है। वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया ने कहा कि किसी समस्या को दूर से देखने पर वह पहाड़ जैसी लगती है, लेकिन उसका सामना करने पर वह छोटी हो जाती है। उन्होंने कहा कि महिला पत्रकारों को दोहरी पहचान—महिला और पत्रकार—के साथ काम करना पड़ता है। अक्सर न्यूजरूम में महत्वपूर्ण बीट्स महिलाओं को कम ही दी जाती हैं और लैंगिक भेदभाव अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। उन्होंने कहा कि परिवार, फील्डवर्क और लैंगिक असमानता—इन तीन मोर्चों पर संघर्ष के कारण कई महिलाएं पत्रकारिता छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। इसी कारण इस क्षेत्र में महिला रिपोर्टरों की संख्या कम है और वे अपेक्षाकृत जल्दी पेशा छोड़ देती हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बलात्कार पीड़िता की तस्वीरों में उसे हमेशा सिर झुकाए हुए क्यों दिखाया जाता है, उसे संघर्ष करते हुए क्यों नहीं दिखाया जाता। हालांकि उन्होंने विश्वास जताया कि समय के साथ ये धारणाएं बदल रही हैं और पत्रकारिता में लैंगिक समानता बढ़ेगी। मध्यप्रदेश सरकार के निराला सृजन पीठ की निदेशक डॉ. साधना बलवाटे ने कहा कि पत्रकारिता में ग्लैमर बढ़ने से मिशन की भावना कम होती जा रही है। चुनौतियां कम हुई हैं, लेकिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है, खासकर संपादकीय पदों पर। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन पत्रकारिता में साहित्यिक तत्व कम होता जा रहा है। भाषा की स्पष्टता और सुंदरता को बनाए रखना जरूरी है। माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की शोध निदेशक डॉ. मंगला अनुजा ने कहा कि भारत में महिला पत्रकारिता का पहला उदाहरण 1835 में मिलता है, इसलिए भारतीय महिलाएं इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर से बहुत पीछे नहीं हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को कार्यस्थल पर भेदभाव, पदोन्नति में बाधा और सहयोग की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सफलता भी हासिल की है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक और स्व. भुवन भूषण देवलिया के शिष्य उपस्थित रहे। सागर और विदिशा से भी अनेक प्रतिनिधि शामिल हुए।
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