बचपन में पशुओं को तड़पते देखा, ठान लिया डॉक्टर बनना है, डॉ एपी सिंह की कहानी

बचपन में पशुओं को तड़पते देखा, ठान लिया डॉक्टर बनना है, डॉ एपी सिंह की कहानी


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Satna News: डॉ एपी सिंह ने अपने बचपन का एक खास अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके घर की गाय-भैंस अक्सर सर्रा यानी ट्रिपैनोसोमियासिस नामक बीमारी से ग्रसित हो जाती थीं. उस समय इसका इलाज ज्यादा प्रभावी नहीं था.

सतना. मध्य प्रदेश के सतना जिले के पशुपालन एवं डेयरी विभाग में पदस्थ 60 वर्षीय उप-संचालक डॉ एपी सिंह की कहानी सिर्फ एक सरकारी अधिकारी की नहीं बल्कि जुनून, संघर्ष और सेवा की प्रेरणादायक दास्तान है. बचपन में अपने घर की गाय-भैंसों को बीमारी से तड़पते देखने और उन्हें खोने का दर्द ही उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना. उसी समय उन्होंने ठान लिया था कि वह बड़े होकर पशुओं की सेवा करेंगे ताकि किसी किसान को अपने पशु खोने का दर्द न सहना पड़े. आज करीब 27 वर्षों की सेवा के बाद भी उनके अंदर वही समर्पण और ऊर्जा देखने को मिलती है, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है. डॉ सिंह सतना जिले के कोठी कस्बे से करीब दो किलोमीटर दूर ग्राम बम्हरौला के रहने वाले हैं. उनका बचपन पूरी तरह ग्रामीण परिवेश में बीता, जहां घर में बकरी, गाय, भैंस और बैल जैसे कई पशु पाले जाते थे. उस समय पशुओं की बीमारी आम बात थी लेकिन इलाज के लिए डॉक्टर समय पर नहीं पहुंच पाते थे. कई बार देरी होने पर बछड़ों की मौत तक हो जाती थी. इसी दर्दनाक अनुभव ने उनके मन में एक सवाल खड़ा किया और वहीं से उन्होंने तय कर लिया कि वह पशु चिकित्सक बनेंगे और इस क्षेत्र में कुछ बेहतर करेंगे.

डॉ एपी सिंह ने लोकल 18 से अपने बचपन का एक खास अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके घर की गाय-भैंस अक्सर सर्रा यानी ट्रिपैनोसोमियासिस बीमारी से पीड़ित हो जाती थीं. उस समय इस बीमारी का इलाज ज्यादा प्रभावी नहीं था लेकिन जब उन्होंने इस प्रोफेशन में कदम रखा, तो उन्होंने इस बीमारी पर गहराई से अध्ययन किया और विशेष उपचार पद्धति अपनाई. जहां उनके इलाज से अब तक सर्रा से पीड़ित लगभग 90 प्रतिशत पशु पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं. यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में उनकी पहचान एक भरोसेमंद पशु चिकित्सक के रूप में बनी है.

गांव से पढ़ाई कर हासिल की बड़ी सफलता
डॉ सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई. पांचवीं तक की पढ़ाई बम्हरौला में फिर आठवीं पास के गांव भैंसवार से और हायर सेकेंडरी कोठी से पूरी हुई. इसके बाद उन्होंने बीएससी फर्स्ट ईयर के दौरान ही पीएमटी की तैयारी शुरू की. ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण पढ़ाई का मजबूत आधार नहीं था लेकिन उन्होंने दिन-रात 8 से 10 घंटे मेहनत की और आखिरकार पीएमटी में चयनित होकर वेटरनरी कॉलेज जबलपुर में दाखिला लिया. वहीं से उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की और अपने सपनों को साकार करने की दिशा में पहला बड़ा कदम बढ़ाया.

27 साल का लंबा अनुभव और सेवा
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान में तीन साल सेवा देकर की. इसके बाद मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से चयनित होकर वर्ष 1999 से प्रदेश में सेवाएं दे रहे हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में भी तीन साल तक काम किया. इसके अलावा बिरसिंहपुर पशु चिकित्सालय में 6 साल, जिला पशु चिकित्सालय सतना में 13 साल प्रभारी के रूप में और जिला रोग अनुसंधान प्रयोगशाला सतना में पांच साल तक अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वह पिछले तीन महीनों से उप-संचालक के पद पर कार्यरत हैं.

परिवार और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन
डॉ एपी सिंह की कार्यशैली हमेशा अलग रही है. उन्होंने बताया कि उनके करियर में अगर कुछ दिनों को छोड़ दिया जाए, तो वह लगातार सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक काम करते रहे हैं. गांव-गांव जाकर लोगों के घरों में पशुओं का इलाज करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा है. इतने व्यस्त शेड्यूल के बावजूद डॉ सिंह ने अपने परिवार को कभी नजरअंदाज नहीं किया. उन्होंने बताया कि चाहें कितनी भी थकान क्यों न हो, वह रोजाना अपने बच्चों के लिए समय निकालते थे. दोपहर में काम से लौटने के बाद और रात में घर पहुंचकर वह बच्चों के साथ बैठते, उनकी पढ़ाई और दिनभर की गतिविधियों के बारे में चर्चा करते थे. आज उनके दोनों बच्चे बेंगलुरु में अच्छे पद पर नौकरी कर रहे हैं. बेटा आईटी इंजीनियर है और बेटी साइकोलॉजिस्ट के रूप में इंटरनेशनल स्कूल में काउंसलर है, साथ ही उनकी पत्नी भी वर्ग एक वेंकट 2 में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं.

मेहनत और लगन से मिली सफलता
डॉ एपी सिंह की यह कहानी बताती है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो किसी भी परिस्थिति में सफलता हासिल की जा सकती है. एक छोटे से गांव से निकलकर आज वह न सिर्फ एक उच्च पद पर कार्यरत हैं बल्कि हजारों पशुपालकों के लिए उम्मीद और भरोसे का नाम बन चुके हैं. उनकी यात्रा आज के युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश देती है कि कठिनाइयों से घबराने के बजाय उन्हें अपनी ताकत बनाना चाहिए.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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