बमबारी की वजह से इंग्लैंड में बॉल बनना बंद, टूट गई है ‘ड्यूक गेंद’ की सप्लाई

बमबारी की वजह से इंग्लैंड में बॉल बनना बंद, टूट गई है ‘ड्यूक गेंद’ की सप्लाई


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बमबारी की वजह से इंग्लैंड में बॉल बनना बंद, टूट गई है ‘ड्यूक गेंद’ की सप्लाई

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पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने Dukes गेंदों की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. नए काउंटी चैंपियनशिप सीज़न की शुरुआत 3 अप्रैल से होनी है, लेकिन उससे कुछ हफ्ते पहले ही इंग्लैंड के काउंटी क्लब्स के सामने गेंदों का संकट खड़ा हो गया है.

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ईरान-इसरायल वॉर के चलते नहीं बन पा रही इंग्लैंड की फेमस ड्यूक बॉल, काउंटी क्रिकेट पर गहराया संकट

नई दिल्ली. दुनिया में चल रहे युद्ध का असर अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेल की दुनिया भी इसकी चपेट में आ गई है. खासकर क्रिकेट, जहां हर छोटी चीज़ मैच के नतीजे को प्रभावित कर सकती है अब एक बुनियादी चीज़ की कमी से जूझ रहा है. इंग्लैंड में हालात इतने बिगड़ गए हैं कि नई घरेलू सीज़न की शुरुआत से पहले ही एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है क्रिकेट खेलने के लिए गेंद ही नहीं बची है. यह सुनने में भले अजीब लगे,लेकिन सच्चाई यही है कि के सामने इस वक्त अभूतपूर्व चुनौती खड़ी है.

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब क्रिकेट की दुनिया पर भी साफ नजर आने लगा है. खिलाड़ियों के फंसने, सीरीज़ के रद्द या स्थगित होने के बाद अब इसका सीधा असर इंग्लैंड क्रिकेट पर पड़ा है. जहां पहले माना जा रहा था कि घरेलू सीज़न से पहले पिच या खिलाड़ियों के वर्कलोड जैसी चुनौतियां बड़ी होंगी,वहीं अब एक कहीं ज्यादा गंभीर समस्या सामने आ गई है क्रिकेट गेंदों की भारी कमी. पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने Dukes गेंदों की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. नए काउंटी चैंपियनशिप सीज़न की शुरुआत 3 अप्रैल से होनी है, लेकिन उससे कुछ हफ्ते पहले ही इंग्लैंड के काउंटी क्लब्स के सामने गेंदों का संकट खड़ा हो गया है.

बमबारी का असर बॉल बनने पर 

दरअसल, Dukes गेंदों के निर्माण और सप्लाई की प्रक्रिया काफी जटिल है गेंद का लेदर इंग्लैंड में तैयार होता है, लेकिन उसकी सिलाई भारतीय उपमहाद्वीप में होती है. इसके बाद तैयार गेंदों को हवाई मार्ग से वापस इंग्लैंड भेजा जाता है, जो आमतौर पर मध्य-पूर्व के रास्ते से होकर गुजरता है.यही सप्लाई चेन अब युद्ध की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो गई है. एयरस्पेस में रुकावट और फ्रेट मूवमेंट के धीमा होने के चलते शिपमेंट अटक गए हैं. कई एयरलाइंस इस क्षेत्र से उड़ान भरने से बच रही हैं या फिर भारी शुल्क वसूल रही हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, गेंदों की एक खेप को ट्रांसपोर्ट करने की लागत तीन गुना तक बढ़ गई है और सबसे बड़ी समस्या यह है कि समय पर डिलीवरी नहीं हो पा रही है. Dukes गेंद बनाने वाली कंपनी के मालिक दिलिप जाजोदिया ने इस स्थिति को “बड़ा संकट” करार दिया है. उन्होंने साफ कहा कि क्लब्स को सीज़न की शुरुआत में केवल 50 प्रतिशत गेंदें ही दी जाएंगी और बाकी की व्यवस्था बाद में की जाएगी. हमारे पास उपमहाद्वीप की फैक्ट्रियों में काफी स्टॉक तैयार है, लेकिन एयरलाइंस फ्रेट नहीं ले जा रही हैं, जिससे पूरी सप्लाई चेन जाम हो गई है.

अब क्या करेगा इंग्लैंड क्रिकेट?

काउंटी टीमें सीज़न की शुरुआत सामान्य से आधी गेंदों के साथ करेंगी, जो चार दिवसीय क्रिकेट के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि इसमें गेंद को बार-बार बदला जाता है. इससे खेल की गुणवत्ता और रणनीति दोनों प्रभावित हो सकती हैं. हालांकि, वैकल्पिक रास्तों की तलाश की जा रही है, जैसे कि शिपमेंट को श्रीलंका के जरिए भेजना, लेकिन मौजूदा हालात में यह भी आसान नहीं है. स्थिति को और मुश्किल बनाता है यह तथ्य कि काउंटी क्लब्स पहले किए गए प्रयोग के बाद Kookaburra गेंदों के इस्तेमाल से इनकार कर चुके हैं.कुल मिलाकर, यह संकट सिर्फ लॉजिस्टिक्स का नहीं, बल्कि पूरे इंग्लैंड क्रिकेट सीज़न की दिशा और गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला बनता जा रहा है.



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