Last Updated:
Banana Farming Tips: कृषि विशेषज्ञ उद्यानिकी केके गिरवाल ने लोकल 18 से कहा कि जब जुट के पौधे दो से तीन फीट तक बड़े हो जाते हैं, तब उनके बीच केले के पौधे लगाए जाते हैं. इससे केले के छोटे और नाजुक पौधों को नैचुरल तरीके से छाया मिलती है.
खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में बड़ी संख्या में किसान केले की खेती करते हैं लेकिन जैसे ही गर्मी बढ़ती है, तेज धूप और गर्म हवाएं पौधों को नुकसान पहुंचाने लगती हैं. कई बार पौधे मुरझा जाते हैं और पूरी फसल पर असर पड़ता है. इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि खरगोन में गर्मी के दिनों में तापमान काफी ज्यादा हो जाता है. खेतों में काम करना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे मौसम में केले की फसल को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है. ऐसे में एक देसी जुगाड़ किसानों के लिए काफी कारगर साबित हो रहा है. केले की फसल में जुट के पौधे लगाकर किसान भीषण गर्मी में भी पौधों को सुरक्षित रख पा रहे हैं. कृषि वैज्ञानिक भी इस तरीके को काफी कारगर मानते हैं.
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि जिन किसानों ने अभी केले की बुआई नहीं की है, वे पहले खेत में जुट यानी सन के पौधे लगा दें. यह पौधे बहुत तेजी से बढ़ते हैं और कुछ ही दिनों में अच्छी ऊंचाई हासिल कर लेते हैं. इनकी खास बात यह है कि ये केले के पौधों को सीधी धूप से बचाने में मदद करते हैं. जिले के खरगोन के कसरावद और नर्मदा किनारे वाले इलाकों में किसानों द्वारा यह तरीका तेजी से अपनाया जा रहा है. यहां करीब 40 हजार हेक्टेयर में केले की खेती होती है. किसान ड्रिप पद्धति से पहले जुट के पौधे लगाते हैं और फिर 15 से 20 दिन बाद केले के पौधे रोपते हैं.
केले के पौधों को मिलती है प्राकृतिक छाया
कृषि विशेषज्ञ उद्यानिकी केके गिरवाल लोकल 18 को बताते हैं कि जब जुट के पौधे दो से तीन फीट तक बड़े हो जाते हैं, तब उनके बीच केले के पौधे लगाए जाते हैं. इससे केले के छोटे और नाजुक पौधों को प्राकृतिक रूप से छाया मिलती है. तेज धूप और लू का असर कम हो जाता है, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और उनकी बढ़वार अच्छी होती है. यह तरीका खासतौर पर टिशू कल्चर वाले केले के पौधों के लिए ज्यादा फायदेमंद माना जा रहा है क्योंकि ये पौधे शुरुआत में ज्यादा संवेदनशील होते हैं और इन्हें बचाने के लिए छाया बहुत जरूरी होती है.
मिट्टी में बनी रहती है नमी और उर्वरता
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही बारिश का मौसम शुरू होता है, जुट के पौधों को काटकर खेत में ही बिछा दिया जाता है. इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और पानी जल्दी सूखता नहीं है. यही नहीं, यह सड़कर जैविक खाद में बदल जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और ताकत दोनों बढ़ती है. इस प्रक्रिया से खेत की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और किसानों को अलग से खाद पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता. साथ ही पौधों को पोषण भी बेहतर मिलता है, जिससे उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.
About the Author
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.