पति-पत्नी के बीच ‘उस तरह के’ जिस्मानी रिश्तों पर धारा 377 नहीं लगेगी-MP हाई कोर्ट का फैसला

पति-पत्नी के बीच ‘उस तरह के’ जिस्मानी रिश्तों पर धारा 377 नहीं लगेगी-MP हाई कोर्ट का फैसला


मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में बताया है कि धारा 377, जिसमें ओरल और एनल सेक्स से जुड़े कथित अप्राकृतिक कृत्यों का उल्लेख है. पति‑पत्नी के वैवाहिक संबंधों पर लागू नहीं हो सकते हैं. इसका मतलब यह है कि अब पति‑पत्नी के बीच सहमति या असहमति से जुड़े शारीरिक संबंधों को इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 377 के तहत अप्राकृतिक अपराध नहीं माना जा सकता है.

यह पूरा मामला उस समय सामने आया एक महिला ने प्रताड़ना, दहेज, मारपीट और अनुचित व्यवहार के आरोप अपने पति, ससुर, सास और ननद के खिलाफ लगाए हैं. महिला की तरफ से बताया गया कि शादी के समय चार लाख रुपए और सोने के आभूषण दिए गए थे. लेकिन बाद में सुसराल पक्ष की तरफ से और दहेज की मांग की गई. उससे 6 लाख रुपए और मोटरसाइकिल भी मांगी गई. इसके बाद पुलिस ने इन्हीं आरोपों पर मामला दर्ज किया था.

महिला ने अपने पति के खिलाफ लगाए यौन कृत्य के आरोप
शिकायत में महिला की तरफ से खास तौर पर यह कहा गया कि उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया. इसके अलावा पति उसे यौन कृत्य करने के लिए मजबूर भी करता था. महिला ने ससुर और ननद के खिलाफ भी अनुचित व्यवहार के आरोप लगाए.

पुलिस ने इन धाराओं के तहत दर्ज किया मामला
पुलिस ने इंडियन पीनल कोड की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), धारा 498A (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता), धारा 354(किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला) के तहत मामले दर्ज किए. वहीं दहेज एक्ट का मामला दर्ज भी किया गया था.

कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों को धारा 377 से माना बाहर
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने 25 मार्च को दिए अपने आदेश में कहा कि अभी के कानूनी ढांचे के अनुसार वैवाहिक संबंधों के दायरे में आने वाले आरोपों पर धारा 377 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. IPC में धारा 375 के तहत बलात्कार के आरोप लगाए जा सकते हैं. इसमें penetration, मुख-मैथुन और गुदा-मैथुन जैसे कृत्य भी शामिल हैं. कोर्ट ने यह भी माना कि अगर कोई पति अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है, तो उसे बलात्कार नहीं माना जाएगा. जब तक पत्नी नाबालिग ना हो.

हाई कोर्ट पहुंचा था पति
पति अपने और परिवार के खिलाफ लगाए गए आरोपों से छुटकारा पाने के लिए हाई कोर्ट पहुंचा था. जहां पति के वकील ने कहा कि उसके मुवक्किल के खिलाफ आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है. इसके अलावा महिला के पहले और अब के बयान मेल नहीं खाते हैं.

बाद में कोर्ट ने माना कि धारा 377 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. इसी वजह से इस धारा के तहत लगाए गए आरोप को रद्द कर दिया गया. दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने पति, ससुर और सास के खिलाफ बाकी आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया.



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