सतना का लेबर चौराहा! काम की आस में खड़े हजारों मजदूर, सिस्टम और सुविधा से दूर

सतना का लेबर चौराहा! काम की आस में खड़े हजारों मजदूर, सिस्टम और सुविधा से दूर


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Satna News: यहां काम करने वाले मजदूरों में संगठन या नेतृत्व का अभाव है. 25 साल से यहां आ रहे हरिशंकर तिवारी ने लोकल 18 से कहा कि कभी कोई तय दर या नियम नहीं रहा, जिसके चलते मजदूरों को अलग-अलग दरों पर काम करना पड़ता है.

सतना. मध्य प्रदेश के सतना शहर के बीचोंबीच स्थित लालता चौक का लेबर चौराहा आज भी हजारों मजदूरों के सपनों और संघर्षों का गवाह बना हुआ है. सुबह होते ही यहां का नजारा बदल जाता है. करीब 5000 मजदूर रोजगार की आस में इकट्ठा होते हैं, जिनकी निगाहें हर गुजरते ठेकेदार और काम देने वाले पर टिकी रहती हैं. बदलते दौर, तकनीक और बाजार के बीच भी यह चौराहा आज भी मेहनतकश लोगों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. लालता चौक का यह लेबर चौराहा केवल एक रोजगार स्थल नहीं बल्कि सतना के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. शहर की बसावट के समय लालता प्रसाद द्वारा यहां पहला कुआं बनवाया गया था, जो उस दौर में लोगों की जीवनरेखा था. इसी स्थान पर धीरे-धीरे मजदूरों का जमावड़ा लगने लगा और काम की तलाश का यह सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. तब के समय मजदूरी के बदले अनाज या कपड़े आदि दे दिया जाता था लेकिन समय के साथ भुगतान के तरीके बदलते गए और नकद दिहाड़ी का चलन शुरू हो गया. लोकल 18 की टीम आज के वर्तमान की लेबर चौराहा की स्थिति जानने लालता चौक पहुंची और वहां खड़े मजदूरों से उनकी राय सुनी.

आज की स्थिति में यह चौराहा रोजाना 4000 से 5000 मजदूरों की भीड़ को संभालता है. सुबह 7 बजे से ही यहां हलचल शुरू हो जाती है और शाम तक लोग काम की तलाश में खड़े रहते हैं. लोकल 18 से बातचीत में मजदूर हीरालाल साहू ने बताया कि दिहाड़ी भले ही 500 रुपये तक पहुंच गई हो लेकिन अधिकांश मजदूरों को पूरा पैसा नहीं मिल पाता. कई बार तो दिनभर इंतजार करने के बाद भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है.

सुविधाओं का अभाव और प्रशासन से उम्मीद
मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या यहां मूलभूत सुविधाओं की कमी है. तेज गर्मी, बारिश या सर्दी हर मौसम में मजदूर खुले आसमान के नीचे खड़े रहने को मजबूर हैं. मजदूर हेमंत कुशवाहा बताते हैं कि वर्षों से यही स्थिति बनी हुई है और प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. मजदूरों की मांग है कि यहां कम से कम एक शेड, बैठने की व्यवस्था और पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराई जाए.

बिना सिस्टम और नेतृत्व के संघर्ष
यहां काम करने वाले मजदूरों के सामने एक और बड़ी चुनौती है और वह है किसी तरह का संगठन या नेतृत्व का अभाव. 25 वर्षों से यहां आ रहे हरिशंकर तिवारी कहते हैं कि कभी कोई तय दर या नियम नहीं रहा, जिसके कारण मजदूरों को अलग-अलग दरों पर काम करना पड़ता है. यही वजह है कि यह लेबर मंडी शहर की सबसे सस्ती मजदूरी वाली जगहों में गिनी जाती है.

अभी भी जिंदा है उम्मीद
इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद लालता चौक का यह लेबर चौराहा आज भी हजारों परिवारों के लिए जीवनरेखा बना हुआ है. हर सुबह यहां जुटने वाले मजदूरों के चेहरे पर उम्मीद साफ दिखाई देती है. उम्मीद एक बेहतर दिन की, एक स्थिर रोजगार की और सम्मानजनक जीवन की. बदलते समय के साथ अब जरूरत है कि प्रशासन और समाज मिलकर इस ऐतिहासिक स्थल को बेहतर सुविधाओं और व्यवस्थित प्रणाली से जोड़ें ताकि इन मेहनतकश हाथों को उनका हक और सम्मान मिल सके.

About the Author

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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