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मध्यप्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में एक बाघिन की मौत के बाद बड़ा खुलासा हुआ है. जांच में सामने आया कि रेडियो कॉलर का सिग्नल नहीं मिलने से ट्रैकिंग फेल हो गई. अधिकारियों ने GPS जैमिंग और ग्लोबल सैटेलाइट अड़चने की आशंका जताई है. इस घटना ने वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
एमपी में रेडियो कॉलर आईडी वाली बाघिन की मौत से हड़कंप मचा हुआ है.
भोपाल. मध्यप्रदेश के जंगलों में घूम रहे बाघों की सुरक्षा पर अब एक नया और चौंकाने वाला खतरा सामने आया है. हजारों किलोमीटर दूर खाड़ी क्षेत्र में चल रहे ईरान युद्ध का असर प्रदेश के टाइगर रिजर्व तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. उमरिया और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से जुड़ी एक घटना ने वन विभाग के भीतर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. एक बाघिन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद सामने आए गोपनीय मेमो में सैटेलाइट सिग्नल फेल होने और GPS जैमिंग को संभावित कारण बताया गया है. इस खुलासे ने वन्यजीव संरक्षण की मौजूदा तकनीक पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो छिंदवाड़ा जिले में मृत मिली बाघिन के जले हुए शव और जले हुए रेडियो कॉलर की एक अलग चौंकाने वाली कहानी है. बताया गया था कि शिकारी ने बाघिन को मारने के लिए जहर (यूरिया) का उपयोग किया था. उसने रेडियो कॉलर इसलिए जलाया था क्योंकि उसे पता था कि इसी की ट्रेकिंग करते हुए वन विभाग की टीम उस तक पहुंचेगी और उसके खेत में लगी अवैध अफीम की खेती का भंडाफोड़ हो जाएगा.
नवभारत टाइम्स की एक खबर में गोपनीय मेमो का उल्लेख किया गया है. साथ बताया गया है कि मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि रेडियो कॉलर जैसी अत्याधुनिक तकनीक, जिस पर बाघों की निगरानी निर्भर करती है, वही इस केस में विफल नजर आई. अधिकारियों के अनुसार, कॉलर को हटाने का कमांड समय पर भेजा गया था, लेकिन सिग्नल नहीं मिला. इसके बाद कई दिनों तक विभाग बाघ की लोकेशन से अनजान रहा. जब तलाश पूरी हुई तो बाघ मृत मिला. इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ग्लोबल सैटेलाइट अड़चने अब वन्यजीव संरक्षण के लिए नया खतरा बन रहा है.
कैसे सामने आया मामला
जानकारी के अनुसार, बांधवगढ़ से सतपुड़ा लाए गए एक बाघ को जनवरी 2025 में रेडियो कॉलर लगाया गया था. यह कॉलर उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगाया गया था. दिसंबर 2025 में इसे हटाने की अनुमति मिल गई थी, लेकिन प्रक्रिया में देरी हुई. 19 मार्च को कॉलर गिराने का कमांड भेजा गया, लेकिन सिग्नल नहीं मिला.
सिग्नल फेल होने से बढ़ी मुश्किल
सिग्नल फेल होने के कारण विभाग कई दिनों तक बाघ की लोकेशन ट्रैक नहीं कर सका. 25 मार्च तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई. जब 27 मार्च को टीम मौके पर पहुंची, तो बाघ का शव मिला. साथ ही उसका जला हुआ रेडियो कॉलर भी बरामद हुआ.
GPS जैमिंग और ग्लोबल कनेक्शन
विशेषज्ञों के अनुसार, रेडियो कॉलर वैश्विक सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर होते हैं. युद्ध के दौरान GPS जैमिंग या स्पूफिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. आशंका जताई जा रही है कि इसी वजह से सिग्नल बाधित हुआ. इससे बाघ की निगरानी पूरी तरह प्रभावित हो गई.
अफसरों का बयान और जांच
चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन समिता राजोरा ने कहा कि यह एक गंभीर तकनीकी चुनौती है. उन्होंने बताया कि कॉलर को कमांड मिलते ही गिर जाना चाहिए था.विभाग अब पूरे मामले की जांच कर रहा है. साथ ही नए सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार किए जा रहे हैं.
रिस्पॉन्स सिस्टम पर भी सवाल
इस घटना ने केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि सिस्टम की प्रतिक्रिया क्षमता पर भी सवाल खड़े किए हैं. सिग्नल बंद होते ही ग्राउंड टीम को सक्रिय होना चाहिए था. वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने पूरे सिस्टम के ऑडिट की मांग की है. उनका कहना है कि ऐसी घटनाएं भविष्य में और गंभीर हो सकती हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है. स्थानीय बैकअप सिस्टम विकसित करने की जरूरत है. साथ ही रियल टाइम ग्राउंड रिस्पॉन्स को मजबूत करना होगा. इससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें