Mahavir Jayanti Special: देशभर में दो दिवसीय महावीर जयंती का उत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है. इसी खास अवसर पर चलिए आपको ले चलते हैं धर्म नगरी उज्जैन के एक अद्भुत जैन तीर्थ मंदिर मे जो काफ़ी प्राचीन है. अवंतिका की पावन धरती पर बसा श्री कल्याणमंदिर नवग्रह महातीर्थ अपनी भव्यता से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है. सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर 45 खूबसूरत शिखरों से सजा है, जो दूर से ही आस्था का आभास कराते हैं. मंदिर की सबसे खास बात है भगवान पार्श्वनाथ की दिव्य प्रतिमा, जिसे कारीगरों ने चार महीने तक कठिन तपस्या करते हुए, बिना अन्न-जल ग्रहण किए तराशा है. यह प्रतिमा बेंगलुरु के ग्रीन मरकज पत्थर से निर्मित है, जो आमतौर पर आभूषणों में इस्तेमाल होता है. करीब 25 बीघा में फैले इस मंदिर की दीवारों पर 44 गाथाएं तीन भाषाओं में उकेरी गई हैं, जो भगवान की महिमा का बखान करती हैं. लगभग 50 करोड़ की लागत से बना यह तीर्थ आज आस्था और कला का अद्भुत संगम बन चुका है.
बड़नगर-बदनावर मार्ग पर फैला विशाल परिसर मानो आस्था की एक जीवंत कहानी सुनाता है. करीब 25 बीघा में बने इस मंदिर को आकार लेने में पूरे 10 साल लगे. यहां संत निवास, सती निवास और गुरुकुल जैसी व्यवस्था है, जहां 550 बच्चे पढ़ते हैं और 50 को निःशुल्क शिक्षा मिलती है. परिसर में बन रहा 50 फीट ऊंचा टावर, पार्श्वनाथ भगवान के चार स्वरूपों से सुसज्जित होगा. सबसे खास, अंतिम सीढ़ी से दिखता मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त, जो हर भक्त को मंत्रमुग्ध कर देता है.
धर्म नगरी उज्जैन की पावन भूमि पर एक अद्भुत कथा प्रचलित है. कहा जाता है कि करीब 2000 वर्ष पूर्व, सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में महान जैन आचार्य सिद्धसेन दिवाकर यहां पधारे. वे अपने ज्ञान और सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध थे. एक दिन उन्होंने महाकाल धाम में ध्यान करते हुए शिवलिंग के नीचे विराजित भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा का आभास किया. वहीं, ध्यानमग्न होकर बैठ गए. पुजारियों ने उन्हें हटाने की कोशिश की, लेकिन वे अडिग रहे. जब यह बात सम्राट तक पहुंची, तो उन्होंने आचार्य को हटाने का आदेश दिया. किंतु जैसे ही उन्हें दंड दिया गया, उसकी पीड़ा राजमहल तक महसूस हुई. यह चमत्कार देखकर सम्राट स्वयं उनके चरणों में झुक गए. तब आचार्य ने “कल्याणमंदिर स्त्रोत” की रचना की. जैसे ही 11वीं गाथा पूरी हुई, शिवलिंग विदीर्ण हुआ और पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन हुए. आज भी यह चमत्कारी कथा उज्जैन की आस्था में जीवित है.
कारीगरों ने इस तरह तरासी प्रतिमा
आचार्य बताते हैं कि भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अपनी अनोखी साधना के कारण विशेष मानी जाती है. जयपुर के कुशल शिल्पकारों ने इसे बनाते समय चार महीनों तक कठोर नियमों का पालन किया, ताकि प्रतिमा की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे. यह प्रतिमा हरे मरकज पत्थर से निर्मित है, जो अपनी चमकदार आभा और विशिष्ट बनावट के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यह पत्थर आत्मबल बढ़ाता है. शिल्पकारों की तपस्या और समर्पण इस प्रतिमा को और भी दिव्य बना देते हैं.
45 शिखर है खास
आचार्य की वाणी में गूंजती कथा कुछ यूं है. इस भव्य कल्याणमंदिर में 44 पवित्र गाथाओं की रचना की गई, जिन्हें मंदिर की दीवारों पर 44 भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमाओं के साथ अंकित किया गया है. हर गाथा संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी में लिखी गई, ताकि हर श्रद्धालु इसकी महिमा समझ सके. मंदिर के 45 शिखर भी अपने आप में खास हैं. 44 शिखर पार्श्वनाथ को समर्पित हैं, जबकि 45वां शिखर उज्जैन की मंगलमयी पहचान और नवग्रह मंदिर का प्रतीक है.