जबलपुर में भ्रष्टाचार का अजब-गजब खेल, पुताई के नाम पर निकाले पैसे, कंप्यूटर…

जबलपुर में भ्रष्टाचार का अजब-गजब खेल, पुताई के नाम पर निकाले पैसे, कंप्यूटर…


जबलपुर. मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग की फाइलों के पीछे चल रहा था एक ऐसा खेल, जिसने सरकार के एक करोड़ रुपये हवा में उड़ा दिए. न सामान आया, न ट्रक पहुंचा लेकिन सरकारी खजाने से भारी-भरकम रकम निकाल ली गई. यह सरकारी सिस्टम के भरोसे का कत्ल है. तारीख 17 मार्च और 24 मार्च 2026. जगह जबलपुर स्वास्थ्य विभाग का स्टोर रूम. कागजों पर एंट्री होती है कि लाखों का सामान आ चुका है. बिल नंबर चढ़ते हैं, रसीदें कटती हैं और देखते ही देखते एक करोड़ 74 हजार रुपये के 13 बिल तैयार हो जाते हैं लेकिन जब जांच टीम ने स्टोर का दरवाजा खोला, तो वहां सन्नाटा पसरा था. रैक खाली थे, सामान का नामोनिशान नहीं था पर सरकारी फाइलों में सामान की एंट्री ओके थी.

CMHO डॉ संजय मिश्रा के निलंबन के बाद अब जांच की आंच संजीवनी क्लिनिकों तक पहुंच गई है. डिप्टी कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी की जांच में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. जांच अधिकारी ने पाया कि जिले के अधिकांश संजीवनी क्लिनिकों में पिछले दो साल से पुताई का एक हाथ तक नहीं लगा है लेकिन रिकॉर्ड में मरम्मत और रंग-रोगन का काम पूरा दिखाकर मोटी रकम डकार ली गई. मौके पर मौजूद डॉक्टरों ने खुद तस्दीक की है कि बिल्डिंग बदहाल है और दो साल से यहां कोई पुताई नहीं हुई है जबकि सरकारी खजाने से इसका भुगतान पहले ही किया जा चुका है. भ्रष्टाचार का तमाशा यहीं खत्म नहीं हुआ. जांच में सामग्री सप्लाई के नाम पर भी भारी फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है.

बिना कंप्यूटर हुई प्रिंटर की सप्लाई
डिप्टी कलेक्टर को डॉक्टरों ने बताया कि क्लिनिकों में दो साल से जरूरी सामान की किल्लत बनी हुई थी लेकिन जांच टीम के आने की भनक लगते ही महज दो दिन पहले आनन-फानन में सामान की सप्लाई की गई. इस हड़बड़ी में भ्रष्टाचार की पोल तब खुली, जब क्लिनिकों में प्रिंटर तो सप्लाई कर दिए गए लेकिन उन्हें चलाने के लिए वहां कंप्यूटर तक मौजूद नहीं हैं. बिना कंप्यूटर के प्रिंटर की इस बेतुकी सप्लाई ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

संजीवनी क्लिनिकों के निरीक्षण में गड़बड़ी
डिप्टी कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी ने बताया कि अब तक जिले के 30 से ज्यादा संजीवनी क्लिनिकों की जांच की जा चुकी है और लगभग हर जगह एक ही तरह का पैटर्न सामने आया है. जांच अधिकारी रघुवीर सिंह मरावी के सामने डॉक्टरों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि कैसे सालों से वे बुनियादी सामान के लिए परेशान होते रहे जबकि कागजों पर सप्लाई और भुगतान का खेल चलता रहा. एक ओर जहां एक करोड़ रुपये से अधिक के फर्जी बिलों के मामले में तत्कालीन CMHO पहले ही सस्पेंड हो चुके हैं. वहीं अब इस अदृश्य पुताई और बिना कंप्यूटर वाले प्रिंटर के खुलासे ने विभाग के कई अन्य अधिकारियों की नींद उड़ा दी है. माना जा रहा है कि इस जांच रिपोर्ट के बाद कई और बड़े अफसरों और फर्मों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होना तय है. फिलहाल जांच जारी है.

ऐसे समझें भ्रष्टाचार का पूरा गणित
कागजी एंट्री: 17 मार्च को 6 बिल और 24 मार्च को 7 बिल (कुल 13 बिल) रजिस्टर में दर्ज किए गए.

कुल रकम: इन 13 बिलों की कुल राशि 1,00,74,998 रुपये थी.

भुगतान: नियम विरुद्ध जाकर 12 बिलों का 93,04,998 रुपये का पेमेंट भी कर दिया गया.

हकीकत: स्टोर में सामान भौतिक रूप से उपलब्ध ही नहीं था.

इन 4 चेहरों पर आरोप
जांच रिपोर्ट के आधार पर डॉ संजय मिश्रा (CMHO), आदित्य तिवारी (DPM), जवाहर लोधी और नीरज कौरव को इस गंभीर वित्तीय अनियमितता का मुख्य जिम्मेदार माना गया है.



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