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इंदौर में भोजशाला विवाद में पांचवें दिन की सुनवाई पूरी हो चुकी है. जहां हिंदू पक्ष के वकील ने मंदिर साबित करने के कई तर्क दिए हैं. इसके लिए वकील मनीष गुप्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि राजा भोज द्वारा लिखी गई पुस्तक समरांग सूत्रधार का हवाला भी दिया. उन्होंने कहा कि मंदिरों की संरचना, खंभों, मूर्तियों के विस्तृत वर्णन मिलते हैं.
रिपोर्ट-मिथिलेश गुप्ता
Indore News: इंदौर हाईकोर्ट में धार भोजशाला विवाद पर 6 अप्रैल से रोज सुनवाई हो रही है. अब इस मामले में पांचवें दिन की सुनवाई हो चुकी है, जिसमें हिंदू पक्ष के वकील ने कोर्ट के सामने ऐतिहासिक, शिल्पकला और प्राचीन ग्रंथों के आधार पर विस्तृत तर्क रखे. हिंदू पक्ष की ओर से बताया गया कि भोजशाला कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि मां सरस्वती को समर्पित एक मंदिर और संस्कृत लर्निंग सेंटर था, जिसका उल्लेख विभिन्न प्राचीन ग्रंथों, ब्रिटिश कालीन ‘गजेटियर’ तथा राजा भोज द्वारा रचित विख्यात ग्रंथों में मिलता है.
हिंदू पक्ष की दूसरी याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई शुरू हुई. इसमें लखनऊ निवासी कुलदीप तिवारी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के वकील मनीष गुप्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि राजा भोज द्वारा लिखी गई पुस्तक समरांग सूत्रधार, जिसे राजा भोज ने नगर नियोजन एवं मंदिर वास्तुकला पर लिखा है. उसमें मंदिरों की संरचना, खंभों, मूर्तियों और शिल्पकला के विस्तृत वर्णन मिलते हैं.
हिंदू पक्ष के दूसरे वकील ने मंदिर साबित करने के लिए
वकील मनीष गुप्ता द्वारा तर्क दिया गया कि भोजशाला परिसर की संरचना इसके आयाम, खंभों की बनावट, मूर्तियों की शैली सभी समरांग सूत्रधार में वर्णित सिद्धांतों से मेल खाती हैं. जिससे स्पष्ट है कि यह स्थल मंदिर था. उन्होंने कहा कि 1304 ईसवीं में लिखी गई ‘चिंतामणि’, ब्रिटिश सरकार के 19वीं सदी के धार गजेटियर और इसके अलावा दूसरे ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि धार प्राचीन काल में ज्ञान और विज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां बड़े कवि, विद्वान और वैज्ञानिक आते थे और भोजशाला इसी विद्या-परंपरा का मुख्य केंद्र थी.
ASI की खुदाई के दौरान मिली थी मूर्ति
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि ASI की खुदाई में मिली ब्रह्मा जी की एक दुर्लभ मूर्ति समरांग सूत्रधार में वर्णित युवा अवस्था वाले ब्रह्मा के स्वरूप से पूरी तरह मेल खाती है. साथ ही हिंगलाजगढ़, मंदसौर और रायसेन से मिली मूर्तियां भी उसी शिल्प परंपरा की पुष्टि करती हैं. जिसके आगे चक्कर परमार कालीन राजवंश ने भी अपनाया था और उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भी इसी निर्माण कला से मेल खाता है.
हिंदू पक्ष ने कहा कि उपरोक्त प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि यह स्थल सरस्वती मंदिर था, जहां प्राचीन काल में विद्या, कला और शास्त्रों का अध्ययन होता था. अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी, जिसमें हिंदू पक्ष समरांग सूत्रधार के आयामों और भोजशाला की संरचना के बीच मेल को और विस्तार से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा.