गर्मी बढ़ते ही गुलजार हुआ मटका बाजार! उज्जैन में मिट्टी के घड़ों की बढ़ी डिमांड

गर्मी बढ़ते ही गुलजार हुआ मटका बाजार! उज्जैन में मिट्टी के घड़ों की बढ़ी डिमांड


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उज्जैन जिले में देवास व अन्य जिलों से कुम्हार पहुंचे है. ये परिवार 9 महीने मिट्टी को आकार देकर मटके बनाते हैं. 3 महीने उज्जैन सहित कई शहरों में बेचने निकल पड़ते हैं. करीब 300 से अधिक परिवार घर छोड़कर इस पारंपरिक व्यापार को जीवित रखे हुए हैं. उनकी मेहनत न सिर्फ रोज़गार देती है, बल्कि लोगों को ठंडा, शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक पानी भी उपलब्ध कराती है.

उज्जैन में गर्मी की दस्तक के साथ ही मिट्टी के मटकों का पारंपरिक बाजार फिर गुलजार हो उठा है. बढ़ते तापमान के बीच लोग अब प्राकृतिक ठंडक के लिए मटकों की ओर लौट रहे हैं. इस शहर के अलग-अलग हिस्सों में कुम्हार अपने हाथों से बने मटके, सुराही और घड़े सजाए बैठे हैं. मिट्टी की सोंधी खुशबू और शीतल जल की ताजगी लोगों को आकर्षित कर रही है, जिससे बाजारों में रौनक और भीड़ दोनों बढ़ गई हैं.

मालवा की तपती गर्मी में जब हर कोई ठंडे और शुद्ध पानी की तलाश में है. उज्जैन जिले में देवास व अन्य जिलों से कुम्हार पहुंचे है. कुम्हार परिवार की तो यह अपनी मेहनत से उम्मीद की कहानी लिख रहे हैं. ये परिवार 9 महीने मिट्टी को आकार देकर मटके बनाते हैं. 3 महीने उज्जैन सहित कई शहरों में बेचने निकल पड़ते हैं. करीब 300 से अधिक परिवार घर छोड़कर इस पारंपरिक व्यापार को जीवित रखे हुए हैं. उनकी मेहनत न सिर्फ रोज़गार देती है, बल्कि लोगों को ठंडा, शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक पानी भी उपलब्ध कराती है.

कितने लोगों को चलता है गर्मी से परिवार 
टीम जब उज्जैन मे मटके व्यापरियो के पास पहुंची तो बड़े सुंदर-सुंदर मटके दिखाई दिए. तो उन्होंने बताया 1991 से शुरू हुई यह कहानी सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत है. देवास जिले के खातेगांव के रहने वाले ये कुम्हार अपने पिता और दादाजी के साथ इस हुनर को सीखते हुए बड़े हुए. आज उनके न रहने पर वही जिम्मेदारी अब पत्नी और बच्चों के साथ निभा रहे हैं. साल के 9 महीने मिट्टी से मटके गढ़ते हैं और गर्मी आते ही देवास, उज्जैन, आगर, शाजापुर, मक्सी जैसे शहरों में बेचने निकल पड़ते हैं. खातेगांव से लेकर कन्नौद, धाँसड, बाई और पिपलकोटा तक, 300 से ज्यादा परिवार इस परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं.

अन्य राज्यों से भी पहुंचते है उज्जैन मटके
कुम्हार किसान की पत्नी कांता बाई मुस्कुराते हुए बताती हैं कि गर्मी आते ही उनके मटकों की दुनिया सज उठती है. सबसे ज्यादा मांग बालू-रेती और काले मटकों की होती है. जिनका पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है. इसके बाद नान मटके और बाहर से आने वाले गुजराती मटके भी खूब बिकते हैं. वह अपने परिवार के साथ मिलकर काले, बालू-रेती के मटके और सुराही बनाती हैं, जो आज भी ज्यादातर घरों की पहली पसंद हैं. खास बात यह है कि बालू-रेती के मटके हल्का पानी रिसाकर उसे और ठंडा करते हैं, जबकि मालवा का लाल मटका भी लोगों को खूब भाता है.

जानिए क़ीमत मे कैसे आ रहा है लगातार उछाल 
1991 में जो मटका सिर्फ 20 रुपये में मिलता था, आज वही 350 रुपये तक पहुंच गया है. काले और नान मटकों की कीमत बढ़ी है, जबकि लाल मटके 150 से 300 रुपये में बिकते हैं. करीब 50 हजार की लागत से कुम्हार परिवार मटके तैयार करते हैं और तीन महीने में 3 लाख तक का व्यापार कर लेते हैं. लेकिन यह सफर आसान नहीं—परिवार सहित झोपड़ी में रहकर काम करना पड़ता है. रोज 100 रुपये नगर निगम को देना भी मजबूरी है, फिर भी मिट्टी का यह हुनर उनकी जिंदगी चला रहा है.



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