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गेहूं को घुन और कीड़ों से बचाने के लिए अब महंगी दवाइयों की जरूरत नहीं है। सीधी के एक किसान ने पूर्वजों का देसी तरीका बताया है, जिससे अनाज सालों तक सुरक्षित रहता है। भूसे के सही इस्तेमाल से गेहूं और बीज को बिना खर्च सुरक्षित रखा जा सकता है.
मध्य प्रदेश के सीधी जिले में गेहूं की कटाई के बाद भंडारण किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. मेहनत से उगाया गया अनाज कुछ ही महीनों में घुन और कीड़ों से खराब हो जाता है. जिससे भारी नुकसान होता है. बचाव के लिए लोग लोहे के ड्रम, मिट्टी की ढेरी और नीम की पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं, फिर भी खतरा बना रहता है. ऐसे में 75 वर्षीय किसान रघुनाथ दिन सिंह ने देसी तरीका बताया है, जिसमें गेहूं को भूसे के ढेर में दबाकर रखा जाता है। यह तरीका बिना खर्च के अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखता है.
भरतपुर के किसान रघुनाथ दिन सिंह ने लोकल 18 से कहा कि यह देसी तरीका उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है. पहले के समय में जहरीले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता था. फिर भी अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रहता था. इसी अनुभव के आधार पर वे आज भी गेहूं को बोरियों में भरकर भूसे के ढेर में दबाकर रखते हैं, जिससे उसमें घुन या कीड़े नहीं लगते.
देसी जुगाड़ से सालों तक सुरक्षित रहेगा गेहूं
इस तकनीक की खासियत इसकी सादगी और असरदार परिणाम हैं। प्रक्रिया के तहत सबसे पहले जमीन पर भूसे की मोटी परत बिछाई जाती है. इसके बाद गेहूं से भरी बोरियों को उस पर रखा जाता है और ऊपर से फिर भूसे की मोटी परत डाल दी जाती है. इस तरह गेहूं चारों ओर से भूसे से ढक जाता है, जिससे अंदर ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है और तापमान स्थिर बना रहता है. यही वजह है कि कीड़े और घुन पनप नहीं पाते है.इस देसी उपाय को अपनाते समय नमी का विशेष ध्यान रखना जरूरी है. रघुनाथ दिन सिंह बताते हैं कि अगर गेहूं पूरी तरह सूखा नहीं है, तो भूसे में दबाने के बाद फफूंद या अन्य कीट लग सकते हैं. इसलिए अनाज को अच्छी तरह धूप में सुखाकर ही बोरियों में भरना चाहिए। यह छोटी-सी सावधानी बड़े नुकसान से बचा सकती है.
घुन-कीड़े रहेंगे कोसों दूर
इसके साथ ही स्टोरेज के लिए सही जगह का चयन भी बेहद अहम है. जिस कमरे या कोठरी में भूसा रखा जाए, वहां सीलन या पानी भरने की समस्या नहीं होनी चाहिए. वेंटिलेशन का उचित इंतजाम जरूरी है, ताकि हवा का संचार बना रहे और नमी अंदर न पहुंचे.सीधी जिले के कई किसान इस पारंपरिक तकनीक को अपनाकर बिना किसी केमिकल के अपने अनाज को सुरक्षित रख रहे हैं. बढ़ती लागत और रसायनों के दुष्प्रभाव के बीच यह देसी जुगाड़ किसानों के लिए किफायती और भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आ रहा है.