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दमोह जिले के चौरई गांव में अंधविश्वास का एक हृदयविदारक मामला सामने आया है. जहां डॉक्टरों द्वारा 7 वर्षीय बच्चे को मृत घोषित किए जाने के बाद भी परिजन उसे जिंदा मानकर तांत्रिक से झाड़फूंक कराते रहे.
सांकेतिक तस्वीर
मध्य प्रदेश के दमोह जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था और गहरे अंधविश्वास के बीच टकराव की एक बेहद विचलित करने वाली घटना सामने आई है. जिला मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर भीलमपुर-बालाकोट मार्ग पर स्थित चौरई गांव में एक परिवार ने विज्ञान और डॉक्टरों की सलाह को दरकिनार कर अपने मृत बच्चे को पुनर्जीवित करने के लिए झाड़फूंक का सहारा लिया. यह मामला तब उजागर हुआ जब 7 वर्षीय मासूम मुरारी की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई, लेकिन उसके परिजनों ने उसे मरा हुआ मानने से इनकार कर दिया. मासूम मुरारी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था और छह बेटियों के बाद उसका जन्म हुआ था, जिससे परिवार की उससे गहरी भावनात्मक आस जुड़ी थी.
7 वर्षीय मुरारी पिछले 10 दिनों से गंभीर बीमारी से जूझ रहा था. परिजन उसे इलाज के लिए पहले सागर ले गए, जहां उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया. डॉक्टरों के अनुसार, बच्चे को गंभीर संक्रमण हुआ था, जो बाद में ‘सेप्टिक शॉक’ और ‘मल्टीपल ऑर्गन डिस्फंक्शन सिंड्रोम’ में तब्दील हो गया. इलाज के दौरान मुरारी की स्थिति लगातार बिगड़ती गई और डॉक्टरों ने सोमवार को उसे मृत घोषित कर दिया. अस्पताल के दस्तावेजों में भी मौत का स्पष्ट कारण संक्रमण और अंगों का काम करना बंद करना बताया गया था. लेकिन असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब परिजन शव लेकर गांव पहुंचे और अंतिम संस्कार के तहत बच्चे को दफनाने की तैयारी करने लगे.
अंतिम विदाई के वक्त गांव के कुछ लोगों ने दावा किया कि बच्चे के शरीर को छूने पर उसे सांस लेते महसूस किया जा रहा है. इस बात ने परिजनों के मन में झूठी उम्मीद जगा दी और उन्होंने एक निजी डॉक्टर को बुलाया. डॉक्टर ने तत्काल बच्चे को जिला अस्पताल ले जाने की सलाह दी, लेकिन परिजन एक तांत्रिक (बाबा) के संपर्क में आ गए. वह बाबा फोन पर ही बच्चे का ‘इलाज’ करने का दावा कर रहा था. बाबा के बहकावे में आकर परिजन घंटों तक घर में ही झाड़फूंक कराते रहे, बच्चे के मुंह में पानी डालते रहे और उसकी सांस चलने का दावा करते रहे.
इस अंधविश्वास के खेल के कारण मासूम का अंतिम संस्कार घंटों टलता रहा. जब लंबे समय तक तंत्र-मंत्र के बाद भी बच्चे के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई और बाबा की बातें झूठी साबित हुईं, तब जाकर परिजनों को हकीकत समझ आई. अंततः सोमवार शाम करीब 4:30 बजे बच्चे के शव को दफनाया गया. यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की कमी के कारण लोग डॉक्टरों से ज्यादा अंधविश्वास और तांत्रिकों पर भरोसा कर बैठते हैं, जिससे मानवीय संवेदनाएं और विज्ञान दोनों की हार होती है.
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें