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21 अक्टूबर 1996, टाइटन कप का तीसरा मुकाबला. चिन्नास्वामी स्टेडियम का शोर अचानक खामोश हो गया था क्योंकि भारत 216 रनों का पीछा करते हुए महज 164 पर 8 विकेट खो चुका था लेकिन फिर जो हुआ, वह क्रिकेट की किताबों में ‘ग्रेट एस्केप’ के रूप में दर्ज हो गया
30 साल पहले जवागल श्रीनाथ और अनिल कुंबले की जोड़ी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाप दिलाई थी सबसे रोमांचक जीत
नई दिल्ली. जब क्रिकेट के इतिहास में ‘करिश्मे’ की बात होती है, तो बेंगलुरु का वह मंजर आंखों के सामने तैर जाता है. वह दौर जब भारत के पास निचले क्रम में बड़े हिटर नहीं थे, लेकिन दो स्थानीय नायकों ने अपनी जुझारू तकनीक और फौलादी इरादों से नामुमकिन को मुमकिन कर दिया. ये मैच उन दोनों खिलाड़ियों के लिए इसलिए भी खास बन गया क्योंकि पहली बार दोनों की मां स्टेडियम और और उनकी ममता ऑस्ट्रेलिया पर भारी पड़ गई.
21 अक्टूबर 1996, टाइटन कप का तीसरा मुकाबला. चिन्नास्वामी स्टेडियम का शोर अचानक खामोश हो गया था क्योंकि भारत 216 रनों का पीछा करते हुए महज 164 पर 8 विकेट खो चुका था लेकिन फिर जो हुआ, वह क्रिकेट की किताबों में ‘ग्रेट एस्केप’ के रूप में दर्ज हो गया.
मार्क टेलर का शतक और भारतीय टॉप ऑर्डर का पतन
मैच की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया के दबदबे के साथ हुई. कप्तान मार्क टेलर ने शानदार 105 रनों की पारी खेलकर अपनी टीम को 215 के सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचाया. जवाब में भारतीय टीम ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. तेंदुलकर, गांगुली और द्रविड़ जैसे दिग्गज पवेलियन लौट चुके थे. जब 8वां विकेट गिरा, तो जीत के लिए 52 रनों की दरकार थी और हाथ में सिर्फ दो पुछल्ले बल्लेबाज थे.
लोकल बॉयज का ‘वोकल’ धमाका
मैदान पर अब भारत के दो सबसे भरोसेमंद गेंदबाज थे अनिल कुंबले और जवागल श्रीनाथ. बेंगलुरु का यह मैदान उनका घरेलू मैदान था उन्होंने हार मानने के बजाय हर गेंद को सम्मान दिया और खराब गेंदों को बाउंड्री के पार पहुँचाया. श्रीनाथ ने आक्रामक रुख अपनाया, तो कुंबले ने एक सधे हुए बल्लेबाज की तरह छोर संभाला. जैसे-जैसे रन कम होते गए, चिन्नास्वामी का शोर फिर से जी उठा. स्टेडियम में बैठी कुंबले की माँ की दुआएं और स्टैंड्स में मौजूद हजारों प्रशंसकों का जोश रंग लाया दोनों ने 9वें विकेट के लिए 52 रनों की अटूट साझेदारी कर डाली.
ऐतिहासिक जीत
सांसें रोक देने वाले इस मुकाबले में भारत ने 7 गेंद शेष रहते ही लक्ष्य हासिल कर लिया. जवागल श्रीनाथ (30*) और अनिल कुंबले (16*) ने दुनिया को दिखा दिया कि क्रिकेट में जब तक आखिरी गेंद न फिक जाए, कुछ भी तय नहीं होता. ऑस्ट्रेलिया के गेंदबाज, जो जीत के बेहद करीब थे, अंत में बेबस नजर आए. यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि बेंगलुरु के दो सपूतों का अपने घरेलू मैदान पर लिखा गया वह महाकाव्य था, जिसे आज भी भारतीय क्रिकेट के सुनहरे पन्नों में गर्व के साथ पढ़ा जाता है.