असलम चमड़ा जेल में, मांस कारोबार पर उसी का कंट्रोल: वन विहार में बेटे-भतीजे की कंपनियां से ही सप्लाई, सालों से टेंडर पर कब्जा – Madhya Pradesh News

असलम चमड़ा जेल में, मांस कारोबार पर उसी का कंट्रोल:  वन विहार में बेटे-भतीजे की कंपनियां से ही सप्लाई, सालों से टेंडर पर कब्जा – Madhya Pradesh News




भोपाल में 250 गायों के अवैध मांस की बरामदगी के मामले में जेल में बंद असलम चमड़ा का नेटवर्क अब भी जिंदा है। सलाखों के पीछे होने के बावजूद वन विहार में मांस सप्लाई के कारोबार पर उसके परिवार का पूरा कंट्रोल है। उसके नाम से कंपनी बनाकर हर साल औसतन 2 करोड़ रुपए का मांस सिर्फ वन विहार को सप्लाई किया जा रहा है। हालात यह हैं कि इस कारोबार में असलम की ऐसी पकड़ बन गई है कि कोई दूसरा कारोबारी सरकारी सिस्टम में घुस ही नहीं पा रहा है। सबसे पहले जानिए, कौन है असलम चमड़ा असलम चमड़ा को भोपाल में मॉडल स्लॉटर हाउस के संचालन की जिम्मेदारी मिली थी, जहां नियम के मुताबिक भैंसों का कत्ल होना था। लेकिन हाल ही में इसी स्लॉटर हाउस से जुड़े कंटेनर से गायों का 26 टन मांस बरामद हुआ। मध्य प्रदेश में गौवध प्रतिबंधित होने के बावजूद इतने मांस की बरामदगी ने पूरे देश में भोपाल की छवि पर सवाल खड़े कर दिए। सरकार ने असलम के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे जेल भेजा। जमानत मिलने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई करते हुए उसे फिर से जेल में बंद कर दिया गया। अब असलम का खेल समझिए… इस बार भी टेंडर में नो एंट्री, दूसरे दावेदार गायब वन विहार ने इस साल भी टेंडर निकाले, लेकिन दो बार तारीख बढ़ाने के बावजूद असलम के परिवार के अलावा किसी ने आवेदन नहीं किया। टेंडर डॉक्यूमेंट्स बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से यही पैटर्न जारी है। तीन कंपनियां, मामूली 5-7 रुपए किलो का फर्क और आखिरकार सप्लाई का काम असलम के परिवार के पास आ जाता है। दो तरह के टेंडर और दो करोड़ का खेल मांस सप्लाई के टेंडर दो तरह के हैं। पहला टेंडर वन विहार नेशनल पार्क के मांसाहारी जानवरों के लिए है, जिसके तहत हर दिन करीब 200 किलो मांस सप्लाई किया जाता है। इस पर सालाना लगभग 1.50 से 1.60 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। दूसरा टेंडर केरवा गिद्ध प्रजनन केंद्र के लिए है, जिसकी सालाना कीमत करीब 40 लाख रुपए है। इस तरह दोनों टेंडरों को मिलाकर हर साल लगभग 2 करोड़ रुपए का मांस सप्लाई होता है। 21 साल पहले धंधे में उतरा, अब इकलौता कारोबारी सूत्रों के अनुसार, असलम चमड़ा ने 2005 से वन विहार में मांस सप्लाई का काम शुरू किया था और 2010 के बाद से यह सिलसिला लगातार जारी है। पिछले पांच वर्षों में भी यही व्यवस्था कायम है। वन विहार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि असलम को यह काम इसलिए आसानी से मिल जाता है क्योंकि उसके पास शहर में मृत जानवरों को उठाने का ठेका भी है। आरोप है कि कई बार रोजाना सप्लाई किए जाने वाले 200 किलो मांस में सड़क हादसों में मरे जानवरों का मांस भी शामिल किया जाता रहा है। अब समझिए, शुक्रवार को जानवरों को भूखा क्यों रखते हैं शुक्रवार को वन विहार में मांसाहारी जानवरों को भोजन नहीं दिया जाता। पूर्व डिप्टी डायरेक्टर वाघमारे के अनुसार, भोपाल में स्लॉटरिंग का अधिकांश काम कुरैशी समुदाय करता है और जुम्मे के कारण इस दिन पशु वध नहीं होता। इसी वजह से जानवरों को उपवास पर रखा जाता है। इनमें शेर भी शामिल हैं। इस बारे में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के विशेषज्ञों की राय भी ली गई। इसमें स्पष्ट किया गया कि सप्ताह में एक दिन भूखा रहने से मांसाहारी जानवरों की सेहत पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता। प्रक्रिया निष्पक्ष है, फिर भी असलम परिवार का वर्चस्व वन विहार के डायरेक्टर विजय कुमार ने माना कि बफेलो मीट सप्लाई में असलम के परिवार का वर्चस्व है। हालांकि, उन्होंने टेंडर प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया। उनका कहना है कि सबसे कम दर देने वाले को ही ठेका मिलता है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल कुछ दूसरे व्यापारियों ने भी रुचि दिखाई थी, लेकिन वे प्रक्रिया से बाहर हो गए थे।



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