प्लास्टिक दीयों से नुकसान! महिलाओं ने बनाए आटे के दीपक, कोशिश को मिली रफ्तार

प्लास्टिक दीयों से नुकसान! महिलाओं ने बनाए आटे के दीपक, कोशिश को मिली रफ्तार


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Khandwa News: मां नर्मदा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष विजया जोशी ने लोकल 18 से कहा कि उन्होंने इस काम की शुरुआत एक छोटे स्तर से की थी लेकिन आज यह एक सफल व्यवसाय का रूप ले चुका है. समूह ने लखपति दीदी योजना के तहत लगभग डेढ़ लाख रुपये का लोन लेकर मशीन खरीदी थी और उत्पादन को बढ़ाया था.

खंडवा. मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की पवित्र नगरी ओंकारेश्वर से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और परंपरा, तीनों को एक साथ जोड़ दिया है. यहां महिलाओं ने आटे के दीपक बनाकर न सिर्फ अपना खुद का व्यवसाय खड़ा किया है बल्कि नर्मदा नदी को प्रदूषण से बचाने की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया है. दरअसल नर्मदा नदी के घाटों पर दीपदान की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. श्रद्धालु बड़ी संख्या में दीप प्रवाहित करते हैं लेकिन समय के साथ प्लास्टिक के दोने और अन्य सामग्री का उपयोग बढ़ने से नदी प्रदूषित होने लगी थी. इससे न केवल जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी बल्कि जलीय जीवों को भी नुकसान पहुंच रहा था. इस समस्या को समझते हुए महिलाओं के स्वयं सहायता समूह ने एक अनोखा समाधान निकाला आटे से दीये बनाने शुरू किए. ये दीपक पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं और पानी में घुलकर मछलियों के लिए भोजन बन जाते हैं. यानी एक ही पहल से पर्यावरण संरक्षण और जीवों की सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हो रही है.

मां नर्मदा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष विजया जोशी लोकल 18 को बताती हैं कि उन्होंने इस काम की शुरुआत एक छोटे स्तर से की थी लेकिन आज यह एक सफल व्यवसाय का रूप ले चुका है. समूह ने लखपति दीदी योजना के तहत करीब डेढ़ लाख रुपये का ऋण लेकर मशीन खरीदी और उत्पादन को बढ़ाया. अब कई महिलाएं इस काम से जुड़कर रोजगार प्राप्त कर रही हैं.

नदी और मछलियों को होता था नुकसान
समूह की सदस्य नर्मदा केवट लोकल 18 को बताती हैं कि उनके परिवार के लोग नाव चलाने का काम करते हैं और वे रोज देखते थे कि प्लास्टिक के दीपक नदी में बहते रहते हैं, जिससे नदी और मछलियों को नुकसान होता है. इसी सोच ने उन्हें इस नए और पर्यावरण हितैषी काम की शुरुआत करने के लिए प्रेरित किया. आज ये आटे के दीपक ओंकारेश्वर और मोरटक्का के घाटों के पास दुकानों पर आसानी से मिल जाते हैं. श्रद्धालु भी अब प्लास्टिक की जगह इन प्राकृतिक दीपकों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे महिलाओं की आय बढ़ रही है और उनके उत्पाद को पहचान भी मिल रही है.

सामाजिक और पर्यावरणीय आंदोलन
इस पहल की खास बात यह है कि यह केवल एक व्यवसाय नहीं बल्कि एक सामाजिक और पर्यावरणीय आंदोलन बनता जा रहा है. नर्मदा नदी को स्वच्छ रखने में यह पहल महत्वपूर्ण योगदान दे रही है, वहीं महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत भी बना रही है.

कलेक्टर ने की सराहना
खंडवा के कलेक्टर ऋषभ गुप्ता ने भी इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण बताया है. ओंकारेश्वर की यह पहल अब एक मॉडल बनती जा रही है, जहां आस्था, रोजगार और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का सुंदर संगम देखने को मिलता है. यह कहानी बताती है कि अगर सोच सकारात्मक हो, तो छोटे-से प्रयास से भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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