मजदूर शब्द सुनते ही पसीने से लथपथ धूप में सीमेंट की बोरियां उठाते, तो कहीं खेतों में कुदाल चलाते श्रमिकों का चेहरा तो सभी को याद आता है। हां, ये वो श्रमिक हैं जिनके पसीने से देश चलता है। लेकिन एक और मजदूर वर्ग है, जिसे शायद खुद ये एहसास काफी देरी से हुआ कि वो मजदूर है। हां, इस मजदूर को पसीना कम आता है, पीठ पर सीमेंट की बोरियों की जगह लैपटॉप का बस्ता है, लेकिन है तो ये भी मजदूर ही। इसकी भी दिहाड़ी लेट आने पर कटती है। तो इस मजदूर दिवस पर देखें कि आखिर एक कॉर्पोरेट मजदूर को क्या चाहिए…
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