इंदौर-अहमदाबाद नेशनल हाईवे 47 पर हुए भीषण हादसे ने 16 परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया है। इंदौर और धार के अस्पतालों में 25 से अधिक लोग अब भी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल ये है-हादसा कैसे हुआ और इसके जिम्मेदार कौन हैं?
भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि मौके पर रोड सेफ्टी के नियमों की खुली अनदेखी हो रही थी। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) की सड़क व्यवस्था पर सवाल उठे, तो इंदौर डीआईजी ने भी सुरक्षा खामियों की ओर इशारा किया। वहीं, लोडिंग वाहन चालक की लापरवाही भी उजागर हुई, जिसने मवेशियों और सामान ढोने वाले वाहन में लोगों को ठूंसकर भर रखा था। सवाल पुलिस और आरटीओ की भूमिका पर भी है, जो ऐसे ओवरलोड वाहनों को नजरअंदाज कर देते हैं। सबसे पहले हादसे के तीन सबसे बड़े जिम्मेदार- पहला जिम्मेदार– NHAI: रिफलेक्टर नहीं, डिवाइडर से सटा रोड बुधवार शाम अंधेरा होते ही इंदौर-अहमदाबाद नेशनल हाईवे-47 पर जियो पेट्रोल पंप के पास दर्दनाक हादसा हुआ। इंदौर से अहमदाबाद की ओर जा रहा तेज रफ्तार लोडिंग वाहन अचानक असंतुलित होकर डिवाइडर पार कर दूसरी लेन में पहुंच गया। सामने से आ रही स्कॉर्पियो से उसकी भीषण टक्कर हुई और लोडिंग वाहन खाई में उतर गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, वाहन की रफ्तार करीब 100 किमी प्रतिघंटा थी और उसने 4 से 5 पलटियां खाईं। खामी 1- डिवाइडर से सटा रोड, सेफ्टी का अभाव हादसे वाली जगह पर रोड और डिवाइडर बेहद करीब हैं। वाहन असंतुलित होते ही डिवाइडर उसे रोक नहीं सका और वह दूसरी तरफ चला गया। यदि डिवाइडर ऊंचा होता या बीच में झाड़ियां/छोटे पेड़ होते, तो वाहन की गति कम हो सकती थी और नुकसान इतना बड़ा नहीं होता। खामी 2- रिफलेक्टर और चेतावनी संकेतक नहीं तेज रफ्तार के बावजूद ड्राइवर को सतर्क करने के लिए मौके पर न रिफलेक्टर थे और न ही येलो लाइट। ऐसे संकेतक होते तो वाहन की गति कम हो सकती थी और हादसा टल सकता था। खामी 3- डिवाइडर डिजाइन में असमानता जहां कट बना है, वहां दोनों डिवाइडर एक लाइन में नहीं हैं। तेज रफ्तार में ड्राइवर को अचानक सामने डिवाइडर समझ नहीं आया और वाहन अनियंत्रित हो गया। इंदौर ग्रामीण डीआईजी मनोज कुमार सिंह ने भी रोड इंजीनियरिंग में खामी की पुष्टि की है। उन्होंने NHAI को पत्र लिखकर सुधार के निर्देश दिए हैं। मौके पर पहुंचे अधिकारी खामियां दुरुस्त करते दिखे, लेकिन बातचीत से बचते रहे। दूसरा जिम्मेदार- लोडिंग वाहन चालक: 50 से ज्यादा मजदूरों को ठूंसकर भरा हादसे का दूसरा बड़ा जिम्मेदार लोडिंग वाहन चालक रहा है। चालक सुरक्षित है, पुलिस ने प्राथमिक उपचार के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जिस वाहन का उपयोग पशु या सामान ढोने के लिए होता है, उसी में लोगों को बैठाकर ले जाया जा रहा था। हैरानी की बात यह कि छोटे से वाहन में 50 से अधिक मजदूर भरे थे। कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं थे। ऊपर से रफ्तार 100 किमी प्रति घंटा के आसपास। ऐसे में थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित होना तय था। खामी 1- मजदूरी का असंगठित और खतरनाक सिस्टम सेमलीपुरा, रामपुरा और नयापुरा गांव की महिलाओं की इस हादसे में मौत हुई है। इन इलाकों में रोजगार का बड़ा संकट है। मजबूरी में लोग दूसरे गांवों में मजदूरी करने जाते हैं। इसके लिए गांव के कुछ लोग लोडिंग वाहन लेकर ठेका लेते हैं और महिलाओं को इकट्ठा कर इन्हीं वाहनों में ठूंसकर ले जाते हैं। खामी 2- कमीशन के लालच में जोखिम मजदूरों को ले जाने वाले ठेकेदार ज्यादा कमाई के लिए क्षमता से अधिक लोगों को भरते हैं। प्रति मजदूर करीब 300 रुपए मजदूरी तय है, जिसमें से ठेकेदार 50 रुपए कमीशन काटते हैं। सुबह गांव के बाहर वाहन खड़ा कर मजदूरों को भर लिया जाता है और शाम को वापस छोड़ा जाता है। खामी 3- जागरूकता और विकल्पों की कमी सेमलीपुरा के आसपास के अधिकांश गांव आदिवासी हैं, जहां शिक्षा और रोजगार के साधन बेहद सीमित हैं। रामपुरा निवासी सीताराम ने बताया कि लोग मजबूरी में ऐसे खतरनाक सफर करते हैं, लेकिन कोई रोकने वाला नहीं। उन्होंने कहा कि हर दिन ऐसे हादसे होते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। तीसरा जिम्मेदार- पुलिस-आरटीओ: लोडिंग वाहनों में अवैध सफर पर ढिलाई क्षेत्र में लोडिंग वाहनों में लोगों का सफर कोई नई बात नहीं है। हादसे के बाद भी इंदौर-अहमदाबाद नेशनल हाईवे पर धार के आसपास और शहर के कई हिस्सों में ऐसे वाहन बेखौफ दौड़ते दिखे। इन्हें रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्रवाई अक्सर खानापूर्ति तक सीमित रह जाती है। दूसरी ओर, आरटीओ का कामकाज भी सवालों के घेरे में है। फिटनेस जांच कैसे होती है, यह इस हादसे ने उजागर कर दिया। खामी 1- कई थानों से गुजरकर भी नहीं रोका गया लोडिंग वाहन में करीब 50 मजदूर भरे थे, जबकि यह सवारी के लिए बना ही नहीं। ऊपर से लोहे का शेड लगाकर अतिरिक्त जगह बनाई गई थी। वाहन नयापुरा, सेमलीपुरा और रामपुरा से सवारियां भरकर करीब 25 किमी दूर लेबड़ के पास बग्गड़ पहुंचा। इस दौरान तिरला, नोगांव और सादलपुर-तीन थाना क्षेत्रों से गुजरा, लेकिन कहीं भी उसे नहीं रोका गया। खामी 2- बीमा खत्म, फिर भी सड़क पर वाहन क्रमांक MP13 ZT 6776 का बीमा 3 मार्च को ही समाप्त हो चुका था, जबकि फिटनेस 1 अप्रैल 2027 तक वैध बताया जा रहा है। ऐसे में बिना बीमा के वाहन का संचालन और उस पर निगरानी की कमी, दोनों ही गंभीर लापरवाही को उजागर करते हैं। तीन गांवों में पसरा दर्द और मातम हादसे ने तीन गांव- रामपुरा, सेमलीपुरा और नयापुरा के लोगों को भीतर तक तोड़ दिया है। 200 से 250 की छोटी आबादी वाले इन गांवों में अब सिर्फ सन्नाटा है। हर गली, हर दरवाजे पर मातम पसरा है। सबसे ज्यादा मौतें नयापुरा में हुईं…एक ही परिवार के आठ लोग इस हादसे में खत्म हो गए। सेमलीपुरा में चार घरों के चूल्हे बुझ गए और वह भी एक ही गली में, एक-दूसरे के बिल्कुल पास। रामपुरा में भी दो महिलाओं प्रिया और मैना की जान चली गई, जबकि एक अब भी अस्पताल में मौत से लड़ रही है। हादसे से मिले दर्द की दो कहानियां पहले पिता गए… अब मां भी चली गई, बेटे की आंखों में बस सन्नाटा सेमलीपुरा की ही 40 वर्षीय अंगुरी भूरिया की कहानी जैसे किस्मत की दोहरी मार है। करीब पांच साल पहले उनके पति की मौत भी एक सड़क हादसे में हुई थी। तब से वह मजदूरी कर घर चला रही थीं। अब उसी तरह का हादसा उन्हें भी छीन कर ले गया। पीछे छूट गया उनका 14 साल का बेटा-विक्रांत। हमने उससे बात करने की कोशिश की… लेकिन उसके शब्द नहीं निकले। आंखों से आंसू बहते रहे और रिश्तेदार उसे संभालते रहे। घर में अब कमाने वाला कोई नहीं और सहारा भी चला गया। बुआ के घर आई किरण… लौटना था, लेकिन लौट न सकी सेमलीपुरा की 9 साल की किरण के लिए ये आखिरी सफर साबित हुआ। वह एक महीने पहले ही अपनी बुआ के घर घूमने आई थी। घर में कोई नहीं था तो वह भी बुआ के साथ उसी लोडिंग वाहन में बैठ गई। शाम तक लौटना था लेकिन वह कभी वापस नहीं आएगी। इसी हादसे में उसकी जिंदगी खत्म हो गई। इस हादसे में 35 वर्षीय भूरीबाई की भी मौत हो गई। उनके रिश्तेदार मुकेश भूरिया बताते हैं कि परिवार में अब सिर्फ तीन बच्चे बचे हैं, पति तो पहले ही गुजर चुके थे।
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