बंगाल में ममता जीतें या हारें… इस ‘कलकत्ता’ से मतलब नहीं! जानें क्यों

बंगाल में ममता जीतें या हारें… इस ‘कलकत्ता’ से मतलब नहीं! जानें क्यों


Balaghat News: विधानसभा चुनाव परिणामों ने पश्चिम बंगाल की हवा बदल दी. सालों से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस की ममता सरकार को बीजेपी ने पटखनी दे दी. बंगाल में मोदी मैजिक चल गया. कोलकाता में जश्न मनाया जा रहा है. लेकिन, एक और कलकत्ता, जहां न विधानसभा चुनाव का शोर रहा, न जीत का जश्न, क्योंकि ये कलकत्ता मध्य प्रदेश में है. जी हां, चौंकिए नहीं, एमपी के बालाघाट जिले में भी कलकत्ता नाम का गांव है. यह गांव किरनापुर तहसील में आता है, जहां कभी नक्सली बेखौफ होकर घूमा करते थे. लोकल 18 की टीम जब कलकत्ता गांव पहुंची, तो कई रोचक किस्से सामने आए. जानें…

नामकरण की अजीब कहानी…
बालाघाट का कलकत्ता गांव जिले के अंदरूनी इलाके में है. इस गांव के नामकरण के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. कलकत्ता के रहने वाले ओमकार भलावे का कहना है कि इस गांव के चारों ओर जंगल हुआ करता था. जंगल में बांस कटाई का समय चल रहा था. ऐसे में शाम के समय वनकर्मी वहां से चले गए और उसी शाम किसी ग्रामीण ने एक जामुन का बड़ा पेड़ काट दिया, जिससे रास्ता ब्लॉक हुआ. वहीं, जब अगले दिन वन कर्मी आए, तो बवाल हो गया. उन्होंने ग्रामीणों से पूछा कि यह पेड़ कब कटा, तो ग्रामीणों ने बार-बार पूछे जाने पर एक ही जवाब दिया “कल कटा” ऐसे में गांव का नाम कलकत्ता पड़ गया.

गांव में था नक्सलियों का मूवमेंट
बालाघाट के कलकत्ता गांव में नक्सलियों का आना-जाना लगा रहता था. वह पहले गांव में ही नक्सली बैठक लिया करते थे. समय के साथ जैसे ही फोर्स की मूवमेंट बढ़ी तो वे सिर्फ रात के अंधेरे में ही कलकत्ता गांव आने की कोशिश करते थे. लेकिन, अब ये इलाका नक्सल मुक्त हो चुका है और विकास की बांट देख रहा है.

कावरे हत्याकांड में गांव पर आई थी आफत
16 दिसंबर 1999 को जब तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखीराम कावरे की नक्सलियों ने हत्या की थी, तब इस गांव पर आफत आ गई थी. दरअसल, मंत्री की हत्या के बाद नक्सलियों ने बकरा पार्टी की थी. वह बकरा इसी गांव के एक व्यक्ति से 300 रुपए में लिया था. फिर गांव से कुछ ही दूरी पर जाकर जंगल में बकरा पार्टी की. बांस की कटाई के लिए गए कुछ लोगों को नक्सलियों ने दिनभर बंधक बनाए रखा. ऐसे में पुलिस ने नक्सलियों के मंसूबों की जानकारी की पूछताछ के लिए 51 लोगों को हिरासत में लिया था. इस दौरान कुछ ग्रामीणों की जमकर पिटाई भी की गई. ऐसे में ग्रामीण लंबे समय तक दहशत में रहे. हालांकि, जैसे-जैसे कावरे हत्याकांड के आरोपी मिलते गए वैसे-वैसे पुलिस ग्रामीणों को छोड़ती गई.

अब पानी के लिए तरस रहा आधा गांव
गांव से नक्सलवाद तो खत्म हुआ, लेकिन सरकारी योजनाएं गांव में खाना पूर्ति की तरह काम कर रही हैं. दरअसल, गांव में जल जीवन मिशन के तहत टंकी ही नहीं बनाई गई. ऐसे में पहले बोरवेल से अंडर ग्राउंड टैंक में पानी भरा जाता, फिर गांव में सप्लाई किया जाता है. ऐसे में यह पानी महज कुछ ही घरों तो पहुंच पाता है. वहीं, गांव के ज्यादातर घर पानी के लिए संघर्ष करते हैं. हैंडपंप सूख गए हैं या फिर लाल पानी निकलता है. ऐसे में ग्रामीण चाहते हैं कि एक पानी टंकी बने, जिससे हर घर तक पानी पहुंच सके.

सड़क का काम अटका
सरकार ने अंदरूनी इलाके को जोड़ने के लिए कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चला रही है. यहां पर किरनापुर को डाबरी से जोड़ने और कई अंदरूनी इलाकों तक पहुंच आसान बनाने के लिए सड़कें बनाई जा रही है. बोदालझोला से आने गोदरी-बटकरी-कलकत्ता तक जोड़ने की कवायद चल रही है. एक तरफ से सड़क तो बन रही है, लेकिन कलकत्ता गांव के कुछ किसानों का दावा है कि जहां से सड़क गुजर रही है, वह उनकी है. ऐसे में वह चाहते हैं कि उन्हें मुआवजा चाहिए. लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वह पुरानी सड़क है.



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