बालाघाट. भारत में साल 2010 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुआ. इसका उद्देश्य है 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना है. साथ ही शिक्षा के समान अवसर का अधिकार प्रदान करना है. इस कानून के लागू होने के बाद उम्मीद ये थी कि शिक्षा में समानता आएगी और हर वर्ग के बच्चों को शिक्षा के समान अवसर मिलेंगे. इसमें एक और जरूरी बात सुनिश्चित की गई है. वो ये है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित होंगी, लेकिन सवाल ये है कि कानून के लागू होने के 15 साल बाद जमीनी हालात कुछ बदले…? शायद नहीं….
अब सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए…
बालाघाट जिले के एक गांव में रहने वाली एक अम्मा से हमने मुलाकात की. उन्होंने बताया कि उनकी नातिन एक निजी स्कूल में RTE के तहत मुफ्त शिक्षा हासिल कर रही थी. बात साल 2021 की है. उनकी नातिन भारतीय विद्या निकेतन माध्य विद्यालय महकेपार नाम के निजी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. अब टीसी और अंकसूची नवमी कक्षा में एडमिशन के लिए बेहद जरूरी थी. ऐसे में उनसे सालों से फीस नहीं ली गई. जब स्कूल बदलने का वक्त आया तो अचानक स्कूल प्रबंधन ने फीस के लिए दबाव बनाया. तब स्कूल संचालक सेठ ने फीस न चुकाने पर अंकसूची और टीसी देने से स्पष्ट इनकार कर दिया. ऐसे में बूढ़ी अम्मा को अपनी नातिन के भविष्य की भी चिंता थी. अब सेठ जी भी अड़ गए. नतीजतन अपने अधिकारों से अंजान अम्मा को 6262 रुपए फीस चुकाने के लिए अपनी पैरपट्टी गिरवी रखनी पड़ी. इससे पहले भी उनका नाती इस स्कूल से पास हुआ था. हालांकि, उनके नाती का RTE के तहत एडमिशन हुआ था या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. लेकिन अपने नाती के टीसी और अंकसूची के लिए भी मंगलसूत्र गिरवी रखना पड़ा था. ये दर्द बयां करते हुए अम्मा कहती है…
“मैं हाथ में ब्लेड लेकर गई थी. पहले मैंने उस सेठ से हाथ जोड़कर विनती की थी. लेकिन उसने बड़े ही प्यार से मना कर दिया. ऐसे में मेरे पास मंगलसूत्र गिरवी रखने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. तब मैंने ब्लेड से मंगलसुत्र काटा और सेठ जी को दे दिया. ऐसा करते वक्त आंख में आंसू थे और जबान से शब्द नहीं निकल रहे थे. इसके बाद अपना रुआँसा चेहरा लेकर मैं वहां से आ गई.”
अब जानिए ताजे मामले
एक महिला ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया कि उनकी बच्ची भारतीय विद्या निकेतन माध्य विद्यालय में साल 2020-21 से पढ़ रही है. तब बच्ची का प्रवेश RTE के तहत ही हुआ था. लेकिन ये बात जानबूझकर हम पालकों से छुपाई गई. इससे पहले हमसे कक्षा एक और दो की फीस वसूली गई. वहीं, बच्ची के कक्षा तीन में थी, तब उन्हें किसी ऑनलाइन सेंटर चलाने वाले शख्स से पता चला कि उनकी बच्ची का एडमिशन RTE के तहत हुआ है. ऐसे में आपसे फीस क्यों वसूली जाएगी. महिला ने स्कूल के प्रधान पाठक को ये जानकारी दी गई, तब उन्होंने फीस लेना बंद कर दिया. वहीं, इससे पहले कच्ची रसीद बनाकर बच्ची के हाथ भेजी जाती कि आपकी फीस बकाया है. उस रसीद पर न तो कक्षा का जिक्र है न ही पिछला या वर्तमान का.
केस-2
इसी तरह का एक और मामला हमारे सामने तब आया, जब एक महिला अपनी बच्ची के RTE के तहत हुआ है या नहीं इसकी जानकारी के लिए सामाजिक कार्यकर्ता के पास पहुंची. इसके बाद जो महिला को जानकारी मिली, जिसके बाद वह दंग रह गई. उन्हें पता चला कि उनकी बच्ची का एडमिशन तो RTE के तहत हुआ है. ऐसे में उन्हें जानकारी मिली की RTE के तहत एडमिशन हुआ है और इसमें फीस नहीं लगती है. जब तक महिला को पता चलता तब तक वह करीब 6 हजार रुपए शुल्क जमा कर चुकी थी. इसमें एक बार तेरह सौ रुपए, जिसे साल 2023 में केजी-1 के नाम पर फीस ली गई. वहीं, साल 2024 में केजी-2 के नाम पर दो हजार रुपए वसूले गए. इसकी रसीद स्कूल प्रबंधन ने ली लेकिन इस सत्र में उन्होंने बच्ची की मां से 2 हजार रुपए वसूले गए, जिसकी रसीद उन्हें नहीं दी गई. इस दौरान उन्हें जानकारी मिली की उनकी बच्ची का एडमिशन RTE के तहत हुआ, तब उन्होंने तीसरी रसीद के लिए प्रधान पाठक से कहा लेकिन उन्होंने रसीद देने से इनकार कर दिया. इसमें सवाल ये उठता है कि केजी-1 की फीस कक्षा तीसरी में पहुंचने के बाद और केजी 2 की फीस कक्षा चौथी में क्यों ली गई. वहीं, वो फीस किस चीज की थी, जिसकी रसीद देने से प्रधानपाठक ने इनकार कर दिया. महिला ने बताया कि वह फीस कक्षा तीन के नाम पर मिली थी.
दरअसल, इस मामले का खुलासा एक RTI यानी सूचना के अधिनियम से हुआ. इस मामले में सामाजिक और RTI एक्टिविस्ट कपिल फूले ने इस तरह के मामले सामने आने के बाद स्कूल से RTE के तहत हुए एडमिशन की जानकारी मांगी थी. इससे जानकारी सामने आई और हमने पालकों से बातचीत की. इससे समझ आया कि ये एक या दो नहीं बल्कि कई लोग इससे पीड़ित है.
इसके बाद RTI एक्ट के माध्यम से लगातार और जानकारी मांगी गई. एक कच्ची सूची कपिल को मिली, जिसमें अम्मा की नातिन के RTE के तहत एडमिशन की जानकारी मिली. इसी तरह की एक RTI साल 2024 में लगाई गई, जिससे कपिल को पहली बार पूरी सूची मिली. इसके बाद हमने पालकों से बातचीत की, जिससे एक नहीं ऐसे कई मामले उजागर हुए जिसमें बच्चों के पालकों से फीस वसूली गई हो. आपको बता दें कि RTE के तहत एडमिशन पाने वाले बच्चों की फीस शासन देता है. ऐसे में इस मामले कपिल फूले एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में आगे आए.
इस मामले में कई पालकों से उनके बच्चे के RTE के तहत प्रवेश होने के जानकारी स्कूल प्रबंधन से छिपाई गई. उन्हें आरटीआई एक्टिविस्ट कपिल ने बताया कि उनके बच्चों का दाखिला RTE के तहत हुआ है. जब पालकों को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने फीस के लिए दबाव बनाना बंद कर दिया.
अब जानिए स्कूल प्रबंधन क्या बोला
मामले की गंभीरता को देखते हुए हमने भारतीय बाल विद्या निकेतन के प्रधान पाठक से बात की. स्कूल बंद होने के कारण वह स्कूल में नहीं थे. ऐसे में फोन पर हुई बातचीत में बताया कि अवैध फीस वसूली का आरोप गलत है. पालकों से जानकारी छिपाने के सवाल पर उन्होंने बताया कि पालकों के जागरुकता के अभाव में हम ही RTE के फॉर्म भरते थे. लेकिन उनसे कभी फीस नहीं वसूली गई.
इसके बाद लोकल 18 रिपोर्टर ने जिम्मेदारों के संज्ञान में मामले को लाया. सबसे पहले जन शिक्षक किशोर मासूरकर से संपर्क किया गया लेकिन उनके पास इस मामले में बातचीत के लिए वक्त नहीं था. फिर हमने डीपीसी घनश्याम बर्मन ने कहा कि ये मामला कटंगी विकासखंड के अंतर्गत आने वाले निजी स्कूल का है. इसमें स्कूल जाकर मामले का पता लगाया जाएगा. और जांच में स्कूल संचालक दोषी पाया जाता है, तो निश्चित ही उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
सरकारी स्कूल बेहतर होते तो प्राइवेट स्कूल मनमानी न करते
इस मामले में हमने मानव अधिकार मित्र फिरोजा खान का कहना है कि कोई भी शख्स अपने बच्चों के फीस के लिए सामान गिरवी रखता है, तो ये सिर्फ बच्चों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन नहीं है बल्कि मानवीय मूल्यों का भी पतन है. ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि सरकारी स्कूल बेहतर नहीं है. इसमें कई समस्याएं है, ऐसे में मजबून पालक अपने बच्चों को अपना पेट काटकर प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे है. इससे प्राइवेट स्कूल अपनी मनमानी कर रहे रहे. हर माता-पिता चाहते हैं कि वह अपने बच्चे को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते हैं. इसका फायदा निजी स्कूल उठा रहे है. ऐसे में शासन-प्रशासन को निजी स्कूलों पर भी लगातार निगरानी रखनी चाहिए. इससे संचालकों की मनमानी पर लगाम लगाई जा सकेगी.