सावन माह के दूसरे सोमवार को रीवा शहर स्थित महामृत्युंजय मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। सुबह 4 बजे से ही श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए मंदिर पहुंचने लगे। किला परिसर के प्रवेश द्वार से लेकर मंदिर तक श्रद्धालुओं की लंबी क
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बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी उम्र के भक्त भगवान महामृत्युंजय के दर्शनों के लिए रीवा और आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे। सुबह से ही जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग और फूलों के साथ पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हो गया था, जो दोपहर से आगे शाम तक जारी रहा। श्रद्धालुओं ने शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाकर महामृत्युंजय मंत्रों का जाप किया।
सुबह से लेकर शाम तक श्रद्धालुओं की कतार लगी रही।
1001 छिद्रों वाला दुर्लभ शिवलिंग यह मंदिर अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित सफेद रंग का शिवलिंग 1001 सूक्ष्म छिद्रों वाला है, जो दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र शिवलिंग माना जाता है। खास बात यह है कि यह शिवलिंग मौसम के अनुसार अपना रंग बदलता है।
कहा जाता है कि रीवा रियासत की स्थापना के पीछे भगवान महामृत्युंजय की अलौकिक शक्ति का हाथ है। एक मान्यता के अनुसार, बांधवगढ़ के राजा एक बार शिकार के लिए इस क्षेत्र में आए थे। उन्होंने देखा कि एक शेर चीतल का पीछा कर रहा है, लेकिन जैसे ही वह मंदिर स्थल के पास पहुंचा, वह शिकार किए बिना लौट गया।
यह देखकर राजा चकित रह गए और इस स्थान की खुदाई करवाई। वहां से भगवान महामृत्युंजय का यह विशेष शिवलिंग प्रकट हुआ। तभी से यहां मंदिर का निर्माण कराया गया और पूजा-अर्चना शुरू हुई।

शिवभक्तों ने एक-एक कर जलाभिषेक किया।
शिव की आराधना महामृत्युंजय रूप में होती है हालांकि मध्यप्रदेश में उज्जैन का महाकालेश्वर और अन्य प्रमुख शिव मंदिर प्रसिद्ध हैं, लेकिन महामृत्युंजय मंदिर को विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि यहां शिव की आराधना महामृत्युंजय रूप में होती है, जो दुर्लभ है।
मंदिर के मुख्य पुजारी वनस्पति तिवारी ने बताया कि सुबह 4 बजे मंदिर के पट खोल दिए गए थे। दिनभर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ बनी रही। भक्त जल, दूध और पूजन सामग्री लेकर पहुंचते रहे और ‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे’ जैसे मंत्रों की गूंज से मंदिर गूंजता रहा।
