कभी देखी है बाजार घूमने की शौकीन हथिनी, हर कोई चाहता है ‘लक्ष्मी’ का आशीर्वाद

कभी देखी है बाजार घूमने की शौकीन हथिनी, हर कोई चाहता है ‘लक्ष्मी’ का आशीर्वाद


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Sagar News: लक्ष्मी (हथिनी) की दिनचर्या की बात करें, तो उसे बाजार घूमना बहुत पसंद है. वह सप्ताह में दो दिन भ्रमण के लिए निकलती है, जिसमें एक दिन बुधवार को वह शहर घूमने जाती है और अगले दिन जंगल जाती है. बाकी दिन…और पढ़ें

लक्ष्मी को बाजार घूमना बहुत पसंद है.
सागर. अगर आप मध्य प्रदेश के सागर के रहने वाले हैं, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि लक्ष्मी को न जानते हों क्योंकि हर व्यक्ति की जितनी ईश्वर में आस्था होती है, उतना ही श्रद्धा भाव यहां लक्ष्मी के प्रति भी है. लक्ष्मी एक हथिनी है. बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्ग तक सभी लक्ष्मी को देखने के लिए उत्साहित रहते हैं. शाम के समय जहां बच्चे और बुजुर्ग उसे केला, ककड़ी, फल आदि खिलाने के लिए मंदिर पहुंचते हैं, तो वहीं जो लोग हथिनी के पास नहीं पहुंच पाते, लक्ष्मी खुद उनके पास तक पहुंच जाती है.

हथिनी लक्ष्मी की दिनचर्या की बात करें, तो उसे बाजार घूमना पसंद है. वह हफ्ते में दो दिन भ्रमण के लिए निकलती है, जिसमें एक दिन बुधवार को शहर घूमने जाती है और अगले दिन जंगल जाती है. बाकी दिन वह आराम करती है. लक्ष्मी जब बाजार या शहर में निकलती है, तो शहर के लोग उसे फल-फूल खिलाते हैं या जो भी प्रतिष्ठान संचालित करता है, वह वही चीजों को उसे खिलाता है, जैसे- मिठाई वाला मिठाई खिलाता है, सब्जी वाला सब्जी, पान वाला पान, किराना वाला बिस्किट-नमकीन. इस तरह कोई न कोई पूरे श्रद्धा भाव से उसे कुछ न कुछ जरूर खिलाता है. कुछ लोग पैसे देते हैं, जिससे महावत भी खुश हो जाता है.

270 साल पहले मठ की स्थापना
दरअसल सागर में वैष्णव संप्रदाय को मानने वाले संतों ने 270 साल पहले श्री देव वृंदावन बाग मठ की स्थापना की थी. यह मध्य भारत का एकमात्र मठ है लेकिन यहां महालक्ष्मी साक्षात गज के साथ विराजमान हैं, इसलिए मंदिर में हथिनी का महत्व बढ़ जाता है. यहां माता लक्ष्मी को गजलक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है. किसी भी त्योहार या बड़े कार्यक्रम में हथिनी लक्ष्मी सबसे आगे होती है. उसके लिए मंदिर में हथिनी द्वार भी है, जिसके अंदर से प्रवेश करते हुए वह परिसर तक पहुंचती है.

पांचवीं पीढ़ी की हथिनी लक्ष्मी
मंदिर के महंत नरहरिदास महाराज लोकल 18 को बताते हैं कि मंदिर में पांच पीढ़ियों से गज परंपरा चली आ रही है. वर्तमान में यह पांचवीं पीढ़ी की हथिनी है, जिसे स्नेह भाव से लक्ष्मी कहते हैं. लक्ष्मी के प्रति लोगों के भाव हैं और लोगों के प्रति लक्ष्मी के भाव हैं.

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