Pitru Paksha 2025: उज्जैन में यहां है विश्व का चौथा वट वक्ष, सिर्फ दूध चढ़ाने से पितृ होते हैं तृप्त

Pitru Paksha 2025: उज्जैन में यहां है विश्व का चौथा वट वक्ष, सिर्फ दूध चढ़ाने से पितृ होते हैं तृप्त


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Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का काफी महत्व होता है और हर कोई अपने पूर्वजों को याद करता है. इसका समापन 21 सितंबर को होगा। उज्जैन में पितृ पक्ष के दौरान मोक्षदायिनी शिप्रा तट का विशेष महत्व है. चलिए जान लेते हैं इसकी पूरी कहानी.

Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का बहुत महत्व माना जाता है. यह पर्व अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करने और उनको श्रद्धांजलि देने का एक खास अवसर होता है. इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करते हैं. श्राद्ध कर्म में पितरों का तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. महाकाल की नगरी उज्जैन में केवल अकाल मृत्यु के भय से ही मुक्ति नहीं मिलती है बल्कि मान्यता है कि यहां लोगों को मोक्ष भी मिलता है. मध्य प्रदेश के उज्जैन में भेरुगढ़ क्षेत्र में मोक्षदायिनी शिप्रा तट पर स्थित अत्यंत प्राचीन मंदिर “सिद्धवट” के नाम से विख्यात है. यहां 12 महीने भक्तों का तांता लगा रहता है. विशेष रूप से पितृ पक्ष के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु तर्पण और पिंडदान करने के लिए आते हैं. मंदिर परिसर में एक प्राचीन वट वृक्ष भी स्थित है. जिसके बारे में मान्यता है कि यहां दूध अर्पित करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है.

उज्जैन के राजा से जुड़ा है इतिहास 
सम्राट विक्रमादित्य ने इसी वट वृक्ष के नीचे तपस्या की थी. तप से मिली शक्तियों के बल पर उन्होंने बेताल को अपने वश में किया था. सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने भी सिद्धवट का पूजन कर धर्म का प्रचार श्रीलंका सहित कई देशों में किया.

मुगल शासनकाल मे हुईं थीयह कोशिश
मुगल शासनकाल में इस वट वृक्ष को कटवाने की कोशिश की गई थी. इसकी शाखाओं पर लोहे के तवे जड़ दिए गए थे. लेकिन वट वृक्ष की शाखाएं लोहे के तवों को तोड़कर फिर से बाहर निकल आईं. स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में बताया गया है कि इस वट वृक्ष को दूध अर्पित करने से वह सीधे पितरों तक पहुंचता है. इस मान्यता के चलते देशभर से श्रद्धालु यहां तर्पण करने आते है.

माता पार्वती से जुड़ा है इतिहास 
स्कंद पुराण के अनुसार, यह वट वृक्ष माता पार्वती द्वारा लगाया गया था. यहां पर पूजा करने से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. बल्कि मोक्ष की प्राप्ति भी होती है. पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु तर्पण और पिंडदान के लिए आते हैं. इस स्थान को वंश वृद्धि और सुख-समृद्धि के लिए भी सिद्ध माना जाता है.

उज्जैन में वट वृक्ष का विशेष महत्व
भारत में चार वट वृक्ष महत्वपूर्ण माने गए हैं, प्रयाग का अक्षयवट, वृंदावन का वंशीवट, गया का बौद्धवट और उज्जैन का सिद्धवट है. पुजारी ने बताया कि स्कंद पुराण के अनुसार, शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी इस वट के नीचे सेनापति नियुक्त हुए और तारकासुर का वध किया. यहां तीन प्रकार की सिद्धि संतति, संपत्ति और सद्गति की प्राप्ति होती है. तीनों की प्राप्ति के लिए लोग सिद्धवट पर दूध चढ़ाने आते हैं. यहां सांद्रता मतलब पितरों के लिए पिंडदान-तर्पण, संपत्ति अर्थात लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रक्षासूत्र बांधने और संतति अर्थात पुत्र प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वास्तिक) बनाने का विधान है.

Deepti Sharma

Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें

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