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Cauliflower Farming: जो किसान इस समय फूलगोभी की फसल लगाते हैं उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ-साथ ऊँचे दाम भी मिलते हैं. खास बात यह है कि फूलगोभी की कई ऐसी उन्नत किस्में मौजूद हैं जो कम समय में तैयार हो जाती हैं. (रिपोर्ट:शिवांक द्विवेदी)
अगर आप किसान हैं और अक्टूबर महीने में नई फसल की तैयारी कर रहे हैं तो फूलगोभी की खेती आपके लिए सुनहरा अवसर साबित हो सकती है. ऐसे में जो किसान इस समय फसल लगाते हैं उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ-साथ ऊँचे दाम भी मिलते हैं. खास बात यह है कि फूलगोभी की कई ऐसी उन्नत किस्में मौजूद हैं जो कम समय में तैयार हो जाती हैं और रोग प्रतिरोधी भी होती हैं.

पूसा स्नोवॉल भारत में सबसे लोकप्रिय फूलगोभी की किस्म मानी जाती है. इसके फूल बड़े, सफेद और घने होते हैं. स्वाद हल्का मीठा और मुलायम होता है. यह किस्म सामान्य रोगों के प्रति प्रतिरोधी है और 70 से 80 दिनों में तैयार हो जाती है. किसान इससे 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज ले सकते हैं. साथ ही यह 15 से 16 डिग्री तक के तापमान को सहन कर लेती है इसलिए अक्टूबर माह में इसकी खेती बेहद लाभदायक होती है.

अगर किसान ठंड के मौसम में फसल लेना चाहते हैं तो पूसा शरद बेहतरीन विकल्प है. यह किस्म 90 से 100 दिनों में तैयार होती है और 25 से 27 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है. इसका स्वाद हल्का मीठा होता है और यह विभिन्न मिट्टी एवं जलवायु परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देती है. यही कारण है कि इसे देशभर के किसान बड़े पैमाने पर उगाते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित पूसा शक्ति किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह किस्म 80 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है और लगभग 44 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सफेद सड़न और काला दाग जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है. फूल बड़े, गोल और चमकदार सफेद होते हैं. कटाई के बाद इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है जिससे किसानों को बाजार में अच्छी कीमत मिलती है.

काशी अघेनी फूलगोभी की एक लोकप्रिय किस्म है जिसे खासतौर पर स्वाद और बाजार की मांग के लिए जाना जाता है. इस किस्म से किसान 25 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज ले सकते हैं. यह लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है और कई बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी होती है. बाजार में इसकी गुणवत्ता और स्वाद की वजह से हमेशा मांग बनी रहती है.

पंत शुभ्रा किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित की गई है. यह 25 से 27 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है और इसकी सबसे बड़ी खूबी है इसका शुद्ध सफेद रंग. इसका स्वाद मीठा और फूल बेहद कोमल होते हैं जिसके कारण उपभोक्ताओं के बीच यह बेहद पसंद की जाती है वहीं रोग प्रतिरोधक क्षमता भी इसे खास बनाती है.

आरएचईओ मीनाक्षी वर्मा ने किसानों को खास सलाह दी कि 15 अक्टूबर से पहले अगेती किस्में जरूर लगाई जाएं. उन्होंने कहा कि नर्सरी के लिए ऐसी जगह का चयन करें जहां धूप और वेंटिलेशन अच्छा हो और पानी का जमाव न हो. नर्सरी को जमीन से थोड़ी ऊँचाई पर तैयार करना बेहतर है. मिट्टी को भुरभुरी बनाकर उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाना पौधों की शुरुआती ग्रोथ के लिए फायदेमंद होता है.

आरएचईओ ने बताया कि नर्सरी बेड का ट्रीटमेंट बाविस्टिन जैसे फफूंदनाशी से करना चाहिए. यह मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद को खत्म करता है और अन्य उर्वरक या कीटनाशक के साथ भी सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है. बीज बोने से पहले कैप्टान या थीराम से सीड ट्रीटमेंट करने से बीज सुरक्षित रहते हैं और अंकुरण दर बेहतर होती है. पौधों को रो-वाइज लगाने से उन्हें पर्याप्त जगह मिलती है और बैक्टीरिया या वायरस संक्रमण का खतरा भी कम होता है.