खेती में अगर आप कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो रबी सीजन की प्रमुख फसल हरी मटर (Green Pea) आपके लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है. यह फसल न केवल किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाती है. यही वजह है कि इसे “सोने पर सुहागा” फसल कहा जाता है.
मटर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम बैक्टीरिया मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करता है. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और अगली फसलों जैसे गेहूं, सरसों या चना की पैदावार भी बढ़ती है. मटर की खेती ठंडे मौसम में की जाती है और इसे बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, इसलिए यह कम सिंचाई वाले इलाकों के लिए भी लाभदायक फसल है.
मटर की खेती के लिए अक्टूबर महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है. खासकर 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच बुवाई करने पर फसल बेहतरीन उत्पादन देती है. बहुत जल्दी या बहुत देर से बुवाई करने पर फूल और फलियों का विकास प्रभावित होता है.
कैसी मिट्टी होनी चाहिए
मटर की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी रहती है. मिट्टी का pH मान 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए. ध्यान रहे कि खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि मटर की जड़ें जलभराव में सड़ जाती हैं. खेती से पहले खेत की एक गहरी जुताई कर लें और इसके बाद 2–3 बार हल्की जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लें. अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट (20-25 टन प्रति हेक्टेयर) खेत में डालना फायदेमंद रहता है.
बीज की मात्रा और उपचार
एक हेक्टेयर में बुवाई के लिए 60 से 80 किलो बीज की जरूरत होती है. बुवाई से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर और थायरम या कार्बेन्डाजिम (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करना जरूरी है. इससे बीज रोगों से सुरक्षित रहते हैं और अंकुरण दर भी बढ़ती है.
बुवाई की विधि
मटर की बुवाई कतारों में 30 से 40 सेंटीमीटर की दूरी पर और पौधों के बीच 8 से 10 सेंटीमीटर की दूरी रखकर करें. बीज को 4–5 सेंटीमीटर गहराई में बोए. बुवाई के बाद हल्की सिंचाई करें ताकि नमी बनी रहे.
सिंचाई और खाद प्रबंधन
मटर को बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन पहली सिंचाई बुवाई के 20 दिन बाद करनी चाहिए। इसके बाद फूल आने और फलियां बनने के समय 2–3 हल्की सिंचाइयां काफी रहती हैं।खाद के रूप में प्रति हेक्टेयर 20 किलो नाइट्रोजन और 50 किलो फास्फोरस डालना उचित है। जैविक खेती करने वाले किसान वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का उपयोग कर सकते हैं।
रोग और कीट नियंत्रण
मटर की फसल में एफिड्स (तेलिया कीट), पाउडरी मिल्ड्यू और रस्ट रोग आमतौर पर देखे जाते हैं. इसके नियंत्रण के लिए समय-समय पर नीम आधारित जैविक कीटनाशक या गंधक का छिड़काव करें.इससे फसल सुरक्षित रहती है और उत्पादन बढ़ता है.
फसल की कटाई
मटर की फलियां बुवाई के 70 से 90 दिनों के भीतर तोड़ने लायक हो जाती हैं. हरी मटर की फलियां नर्म और चमकदार दिखने लगें, तो उन्हें हाथ से तोड़ लेना चाहिए. देरी करने पर फलियां सख्त हो जाती हैं और बाजार में भाव घट जाता है.
मुनाफे का हिसाब
एक हेक्टेयर में औसतन 80 से 100 क्विंटल हरी मटर का उत्पादन मिल सकता है. बाजार में इसका भाव 25 से 40 रुपए प्रति किलो तक मिलता है. यानी किसान को एक एकड़ से 70,000 से 1 लाख रुपए तक का शुद्ध मुनाफा मिल सकता है. वहीं किसान भागीरथ पटेल बताते हैं कि मटर की खेती से मिट्टी सुधरती है, पानी की जरूरत कम पड़ती है और जल्दी पैसा मिल जाता है, इसलिए छोटे किसानों के लिए यह बहुत फायदेमंद फसल है.