राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुक्रवार को रीवा शहर के पद्मधर पार्क में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देशभक्ति की उमंग और सांस्कृतिक उत्साह देखने लायक था। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में रीवा सांसद जनार्दन
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‘वंदे मातरम्’ त्याग और एकता का प्रतीक सांसद जनार्दन मिश्रा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह हमारे देश के स्वाभिमान, त्याग और एकता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों भारतीयों को देशभक्ति की प्रेरणा दी, और आज भी यह हमें राष्ट्रसेवा की भावना से जोड़ता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से माहौल हुआ भावनात्मक कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने देशभक्ति गीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से वातावरण को भावनात्मक बना दिया। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने एक स्वर में ‘वंदे मातरम्’ गाकर मातृभूमि के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
150 साल पुराना है गीत का इतिहास वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत कहा जाता है। इसका इतिहास 150 साल पुराना है। इसकी रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक में संस्कृत और बंगाली भाषा के मिश्रण में की थी और इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में भी शामिल किया गया था। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया था। इसने लोगों को एकजुट करने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होने में बड़ी भूमिका निभाई।