गृहमंत्री के बंगले के पास मासूम का रेप-मर्डर: चेहरे को पत्थर से कुचला, कुत्ते खा गए हाथ-पैर; पुलिस के सामने थीं 5 चुनौतियां – Madhya Pradesh News

गृहमंत्री के बंगले के पास मासूम का रेप-मर्डर:  चेहरे को पत्थर से कुचला, कुत्ते खा गए हाथ-पैर; पुलिस के सामने थीं 5 चुनौतियां – Madhya Pradesh News


वह 4 फरवरी 2013 की एक सर्द दोपहर थी। भोपाल में सर्दियों की विदाई का समय था, लेकिन शामें अभी भी सिहरन पैदा कर रही थीं। सूरज ढलने के साथ ही ठंडी हवाएं जोर पकड़ने लगती थीं। ऐसी ही एक ढलती शाम को, शहर के सबसे पॉश और सुरक्षित माने जाने वाले इलाके, टीटी नग

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‘सर, मैं दशहरा मैदान के पास से बोल रहा हूं… मैं यहां से गुजर रहा था, और मैंने देखा कि सड़क के किनारे एक कुत्ता एक छोटे बच्चे का हाथ मुंह में दबाकर ले जा रहा है।”

बंगले के पास झाड़ियों में मिली बच्ची की लाश यह पता सुनते ही कॉल अटेंड करने वाले पुलिसवाले के शरीर में जैसे 440 वॉट का करंट दौड़ गया। 45 बंगले! यह तो VVIP इलाका था। यहीं पर प्रदेश के गृहमंत्री का बंगला था। “गृहमंत्री के बंगले के पास लाश…।” यह विचार ही किसी भी पुलिसकर्मी के होश उड़ाने के लिए काफी था।

फोन कटने के कुछ ही मिनटों के भीतर, पुलिस की गाड़ियों के सायरन उस शांत इलाके की खामोशी को चीरने लगे। एक के बाद एक गाड़ियां गृहमंत्री के बंगले के पास पहुंचने लगीं। सिपाहियों ने बताई गई जगह पर सर्चिंग शुरू की, और जल्द ही उनकी सबसे बुरी आशंका सच साबित हुई। बंगले के पास की झाड़ियों में एक बच्ची की लाश पड़ी हुई थी।

तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के घर के पास वो जगह जहां 12 साल पहले बच्ची की लाश मिली थी।

तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के घर के पास वो जगह जहां 12 साल पहले बच्ची की लाश मिली थी।

हाई-प्रोफाइल मामला और पुलिस पर बढ़ता दबाव यह मामला बेहद हाई-प्रोफाइल था। उस समय उमाशंकर गुप्ता प्रदेश के गृहमंत्री थे। पूरे राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और खाकी वर्दी के मुखिया, जिनके बंगले पर 24 घंटे सुरक्षा का कड़ा पहरा रहता हो, उसी बंगले के पास झाड़ियों में एक बच्ची का शव मिलना, हर किसी के लिए एक चौंकाने वाली और शर्मनाक बात थी।

बच्ची का चेहरा किसी भारी चीज से बुरी तरह कुचला गया था, शायद पहचान मिटाने के इरादे से। खून से लथपथ लाश को कुत्तों ने कई जगहों से नोंच डाला था, जिससे वह और भी वीभत्स लग रही थी। थोड़ी ही देर में टीटी नगर थाने का पूरा स्टाफ मौके पर था। जल्द ही भोपाल पुलिस के दोनों एसपी, डीआईजी और आईजी भी अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंच गए।

तत्कालीन डीजीपी खुद मौके पर पहुंचे मौके पर मौजूद हर अफसर के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। हर कोई सोच रहा था कि इस मामले की गाज किस-किस पर गिरेगी। कुछ ही देर में, मामले की गंभीरता को देखते हुए, तत्कालीन डीजीपी नंदन दुबे खुद मौके पर पहुंचे। तमाम एक्सपर्ट अपनी जांच में लगे थे, लेकिन अभी तक यह भी साफ नहीं हो पा रहा था कि बच्ची की हत्या यहीं की गई है या उसे कहीं और मारकर यहां फेंका गया है।

लाश का पंचनामा बनाकर उसे पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया। डीजीपी ने मौके पर मौजूद अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए, “45 बंगले जैसे हाई-सिक्योरिटी एरिया में हत्या हो जाना एक बहुत ही गंभीर मामला है। फोर्स के सबसे बेहतरीन अधिकारियों को इसकी जांच में लगाओ। सभी को अलर्ट कर दो, इस मामले से जुड़े हर पहलू की गहराई से जांच होनी चाहिए।

लाश की शिनाख्त थी सबसे बड़ी चुनौती पुलिस के सामने पहली और सबसे बड़ी चुनौती लाश की पहचान करना था। चेहरा इतना बुरी तरह कुचला हुआ था कि उसे पहचानना नामुमकिन था। शव को देखकर बस इतना अंदाजा लगाया जा सकता था कि यह किसी छोटी बच्ची का है, जिसकी उम्र करीब 7-8 साल रही होगी। कुत्तों ने हाथ-पैर भी नोंचे थे। शरीर पर एक फ्रॉक के अलावा ऐसा कोई निशान या गहना नहीं था, जिससे उसकी पहचान हो सके।

लेकिन तभी, बच्ची की लाश को देखते ही थाने के कुछ पुलिसकर्मियों का ध्यान एक रात पहले थाने आए एक परेशान दंपती पर गया। नाइट शिफ्ट में तैनात स्टाफ ने डीआईजी श्रीनिवास वर्मा को बताया, ‘सर, कल देर रात दशहरा मैदान के पास की झुग्गी में रहने वाला एक आदमी और उसकी पत्नी थाने आए थे। दोनों बहुत चिंता में थे।’

दंपती ने बताया कि बेटी मेले में गई थी उन्होंने बताया था, ‘हमारी झुग्गी मैदान के पास ही है। मैदान में मेला लगा हुआ है, और हमारी दोनों बेटियां अक्सर वहां घूमने चली जाती हैं। आज शाम जब हम काम से लौटे, तो 8 साल की बड़ी बेटी घर पर नहीं थी। हमें लगा कि मेला घूमने गई होगी, आ जाएगी। लेकिन जब देर रात तक वह वापस नहीं आई, तो हमने उसे खोजना शुरू किया। हमने पड़ोस में पूछताछ की, फिर पूरा मेला छान मारा।

बाजार में भी पूछा, लेकिन हमारी बेटी कहीं नहीं मिली। अब तो सारा बाजार और मेला भी बंद हो गया है, और बेटी अब तक घर नहीं आई है। आप उसे ढूंढ दो साहब… पुलिस ने उस समय गुमशुदगी दर्ज कर वायरलेस पर मैसेज प्रसारित किया था और माता-पिता के साथ एक हवलदार को भेजकर आसपास पूछताछ भी कराई थी, लेकिन बच्ची का कुछ पता नहीं चला था।

झाड़ियों में मिली लाश का हुलिया और उम्र उसी गुमशुदा बच्ची से मिल रहा था। पुलिस ने तुरंत उस दंपती को बुलवाया। कुछ ही देर में, एक अधेड़ उम्र का पुरुष और एक महिला कांपते हुए पुलिस के सामने खड़े थे। लाश की हालत इतनी खराब थी कि पुलिस उन्हें शव दिखाने की हिम्मत नहीं कर सकी। पुलिस ने बच्ची के शरीर पर मिली फ्रॉक उन्हें दिखाई।

मां बोली- बड़ी बहन छोटी को संभालती थी दंपती ने बताया कि उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, न ही किसी से कोई पैसे का लेनदेन है। वे बस मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। यह उनकी बड़ी बेटी थी, और उसकी एक छोटी बहन भी है जो छह साल की है। जब वे दोनों काम पर जाते थे, तो बड़ी बेटी ही छोटी बहन को संभालती थी। वह अपनी छोटी बहन के साथ साए की तरह रहती थी और उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती थी।

जांच का जिम्मा और बढ़ता दबाव मामले की जांच का जिम्मा तत्कालीन थाना प्रभारी और अब रिटायर्ड डीएसपी सुबोध तोमर को सौंपा गया। तोमर बताते हैं, “उस समय मैं पिपलानी थाने में पोस्टेड था, लेकिन मैं पहले टीटी नगर में टीआई रह चुका था। मुझे उस इलाके का चप्पा-चप्पा पता था। डीआईजी साहब ने कहा, ‘तोमर, तुम इस मामले की जांच करो।

पुलिस को नहीं मिला हत्यारे का सुराग तोमर बताते हैं कि परिवार और पूरे इलाके में पूछताछ करने के बाद भी कोई सुराग हाथ नहीं लगा। दूसरी तरफ, एक छोटी बच्ची के साथ हुई इस हैवानियत को लेकर जनता में भारी गुस्सा था। लोग सड़कों पर उतरने लगे थे, कैंडल मार्च निकाले जा रहे थे। विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर था। एक तरफ जनता का गुस्सा था, तो दूसरी तरफ अधिकारियों का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा था।

डीआईजी और एसपी ने थाने के पास ही सीएसपी ऑफिस में कैंप लगा लिया था। वे हर आधे घंटे में तोमर को बुलाते और पूछते, ‘क्या अपडेट है?’ पुलिस टीम मोबाइल टावर लोकेशन से लेकर तकनीक से जुड़ी हर तरकीब आजमा चुकी थी, लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। अब पूरा दारोमदार उस पारंपरिक पुलिसिंग पर आ गया था, जो सालों पहले हुआ करती थी।

अंधेरे में रोशनी की एक किरण तब तोमर ने एक नई रणनीति अपनाई। उन्होंने माता-पिता से बच्ची की एक तस्वीर ली और अपनी टीम के साथ दशहरा मैदान के मेले में पहुंच गए। उन्होंने एक-एक दुकानदार, हर झूले वाले और हर स्टॉल वाले के पास जाकर बच्ची की तस्वीर दिखाकर पूछना शुरू किया। मेले में घूम-घूमकर पड़ताल करने की यह तरकीब काम करती दिखी।

घंटों की मशक्कत के बाद, एक झूले वाले ने तस्वीर को पहचान लिया। उसने बताया, “हां, यह बच्ची तो कल यहां आई थी…” इस एक सुराग ने पुलिस को अंधेरे में रोशनी की एक किरण दिखा दी थी। जांच अब एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई थी।

मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट-2 में पढ़िए

  • आखिर बच्ची झूले तक कैसे पहुंची थी?
  • क्या वह अकेली थी या फिर कोई और उसके साथ था?
  • यहां से वह खुले मैदान तक कैसे पहुंची?
  • उसके साथ रेप और फिर हत्या किसने की ?

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तारीख 3 अप्रैल 2022। बालाघाट जिले से लगभग 85 किलोमीटर दूर, तिरोड़ी के एक शांत गांव में उस दिन सुबह के 10 बजे थे। सभी लोग अपने कामकाज में जुटे थे। एक घर के आंगन में दो नन्हीं बच्चियां खेल रही थीं। बड़ी बहन की उम्र 6 साल और छोटी की उम्र 3 साल थी। दोनों अपनी ही दुनिया में मगन थीं। दोनों अचानक गायब हो गईं। पढ़ें पूरी खबर…

लोअर कोर्ट से फांसी, हाईकोर्ट से बरी

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