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Agriculture Tips: चना की खेती में बुआई के 20 से 30 दिन की अवधि में कॉलर रॉट (ड्राई रूट) का प्रकोप आमतौर पर देखा जाता है. कई बार यह बीमारी किसानों की लापरवाही के कारण भी फैलती है. जरूरत से ज्यादा सिंचाई करने पर खेतों में अधिक नमी बन जाती है, जिससे फफूंद जनित रोग तेजी से पनपने लगते हैं.
खरगोन. रबी सीजन में चना किसानों की प्रमुख नकदी फसल मानी जाती है, लेकिन खेती के शुरुआती दिनों में की गई एक छोटी सी लापरवाही पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार चना की फसल में बुआई के 20 से 30 दिन बाद एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, जिसे ड्राई रूट रॉट, कॉलर रॉट और जड़ सड़न कहा जाता है. यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो खड़ी फसल देखते ही देखते सूख सकती है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.
मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में इस वर्ष रबी सीजन के दौरान करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में चना की खेती की जा रही है. अधिकांश क्षेत्र में बुआई पूरी हो चुकी है, जबकि जिन किसानों के खेत देर से खाली हुए हैं, वे अभी पिछेती बुआई में जुटे हुए हैं. ऐसे में कृषि वैज्ञानिक किसानों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि फसल की प्रारंभिक अवस्था में आने वाली ये बीमारियां पूरे खेत को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
चना में बीमारी लगने का प्रमुख कारण
खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीएस कुलमी बताते हैं कि चना की खेती में बुआई के 20 से 30 दिन की अवधि में कॉलर रॉट (ड्राई रूट) का प्रकोप आमतौर पर देखा जाता है. कई बार यह बीमारी किसानों की लापरवाही के कारण भी फैलती है. जरूरत से ज्यादा सिंचाई करने पर खेतों में अधिक नमी बन जाती है, जिससे फफूंद जनित रोग तेजी से पनपने लगते हैं. इसलिए संतुलित मात्रा में सिंचाई करना चाहिए.
बीजोपचार करने के फायदे क्या है?
विशेषज्ञ कहते है कि, इन बीमारियों से बचाव के लिए सबसे प्रभावी तरीका बुआई से पहले बीजोपचार है. यदि किसान शुरुआत में ही बीजोपचार कर लेते हैं तो फसल काफी हद तक सुरक्षित रहती है. चना के बीजोपचार के लिए फफूंदनाशक दवाइयों का उपयोग करना चाहिए. ट्राईकोडर्मा 5 ग्राम प्रति किलो बीज और वीटावेक्स पावर 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर बीजोपचार करें. इसके बाद राइजोबियम कल्चर और पीएसबी (पीएचबी) कल्चर 5-5 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचार करना लाभकारी रहता है. इससे पौधों में गांठें जल्दी बनती हैं और फसल की बढ़वार अच्छी होती है.
बीमारी नियंत्रण के लिए क्या करें?
यदि बीजोपचार के बावजूद फसल में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत दवाओं का छिड़काव करना चाहिए. कॉलर रॉट बीमारी में पौधे पहले हल्के पीले पड़ते हैं और फिर सूखने लगते हैं. वहीं जड़ सड़न में पौधों की जड़ों में फफूंद और कीट लग जाते हैं, जिससे पूरा पौधा सड़ जाता है. ऐसे में मेटालेक्जिल और मैनकोज़ेब दवा 30 ग्राम प्रति पंप पानी में घोलकर जमीन में ड्रेंचिंग या छिड़काव करना चाहिए. यदि यह दवा उपलब्ध न हो तो कार्बेंडाजिम 50 का भी उपयोग किया जा सकता है. ओर अपनी फसल को नष्ट होने से बचाया जा सकता है.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें