इस जनजाति को कहा जाता है जंगलियों का जंगली, खान-पान, पहनावा देख हो जाएंगे दंग

इस जनजाति को कहा जाता है जंगलियों का जंगली, खान-पान, पहनावा देख हो जाएंगे दंग


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Jabalpur news: भारत में सबसे ज्यादा जनजातीय आबादी मध्यप्रदेश में निवास रहती है. ऐसे में जनजातियों में दूसरी सबसे बड़ी जनजाति भारिया जनजाति है. जिन्हें जंगलियों का जंगली भी कहा जाता है. यह जनजाति छिंदवाड़ा जैसे दुर्गम घाटी पातालकोट से 3 हजार फीट गहराई के बसे गांव में रहती है साथ ही जबलपुर, सिवनी क्षेत्र में भी निवास करती है.

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जबलपुर: भारत में सबसे ज्यादा जनजातीय आबादी मध्यप्रदेश में निवास रहती है. ऐसे में जनजातियों में दूसरी सबसे बड़ी जनजाति भारिया जनजाति है. जिन्हें जंगलियों का जंगली भी कहा जाता है. यह जनजाति छिंदवाड़ा जैसे दुर्गम घाटी पातालकोट से 3 हजार फीट गहराई के बसे गांव में रहती है साथ ही जबलपुर, सिवनी क्षेत्र में भी निवास करती है.

छिंदवाड़ा के पातालकोट में आदिवासी भारिया जनजाति का प्रमुख बसेरा है. जहां 79 वर्ग किलोमीटर के पातालकोट में करीब 12 गांव में 600 से ज्यादा भारिया जनजाति के लोग रहते हैं. जिनका जीवन जल जंगल और जमीन पर आधारित है. लिहाजा भारत सरकार ने भारिया जनजाति को पातालकोट का मालिक बना दिया है. भारिया जनजाति भारत की विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक है.

इस जनजाति का खान-पान और पहनावा

भारिया जनजाति के माखनलाल भारती ने लोकल 18 से बताया हमारा खान-पान सबसे अलग हैं. महुए का लचका, आम के बीजी और गोई की रोटी खाते हैं और जंगल की भाजियों के साथ ही वनोपज पर निर्भर रहते हैं. उन्होंने बताया स्थानीय बोली भरियाटी है. जिससे हमारी जनजाति की पहचान होती है. भारिया जनजाति के पुरुष धोती कुर्ता, बंडी, पगड़ी और कलगी से लेकर जेवर पहनते हैं, जबकि महिलाएं 16 हाथ की साड़ियां अंगिया और ज्वेलरी में बाकडा, कंगना, गुलेठा और करधोना पहनती हैं.

गोंड जनजाति को मानते हैं बड़ा भाई, इस तरह पड़ा नाम

भारिया जनजाति के लोग गोंड जनजाति को अपना बड़ा भाई मानते हैं, ऐसा माना जाता है मराठा शासको के अधीन भार ढोने के कारण इस जनजाति का नाम भारिया पड़ा था. भारिया जनजाति के लोग द्रविड़ भाषा परिवार से होते हैं, जो अपने निवास स्थान को ढाना भी कहते हैं. इनका पारंपरिक नृत्य भड़म और कर्मा होता है. जो भीमसेन और बड़े देव जैसे देवताओं की पूजा करते हैं. यही कारण है की भारिया जनजाति के लोगों को पातालकोट का जंगली भी कहा जाता है. जिनका रहन-सहन दूसरी जनजातियों से काफी अलग होता है.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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