हाईकोर्ट ने SDOP रवि भदौरिया पर प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं: कहा- सुनवाई का अवसर दिए बिना कठोर टिप्पणी प्राकृतिक न्याय के खिलाफ – Gwalior News

हाईकोर्ट ने SDOP रवि भदौरिया पर प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं:  कहा- सुनवाई का अवसर दिए बिना कठोर टिप्पणी प्राकृतिक न्याय के खिलाफ – Gwalior News



ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एसडीओपी रवि भदौरिया के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की ओर से की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कठोर या कलंकित करने वाली टिप्पणी करने से पहले उसे सुनवाई का

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बिना अवसर दिए की गई टिप्पणियां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हैं और कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकतीं।

याचिकाकर्ता रवि भदौरिया उस समय पुरानी छावनी क्षेत्र में पदस्थ थे। उन्होंने विशेष सत्र न्यायाधीश के 30 अगस्त 2025 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने तर्क रखा कि विशेष न्यायालय ने बिना कोई नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर दिए गंभीर टिप्पणियां कीं, जिससे याचिकाकर्ता के सेवा-करियर पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ सकता था।

‘ऐसी टिप्पणियों अधिकारी के सेवा-करियर असर डाल सकती है’

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता को मामले में केवल धारा 174 के तहत सीमित मर्ग जांच सौंपी गई थी, न कि पूर्ण आपराधिक जांच। इसके अलावा, जिन तिथियों को लेकर निष्क्रियता का आरोप लगाया गया था, उस अवधि में याचिकाकर्ता प्रकरण से संबंधित ही नहीं थे।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को न तो कोई नोटिस जारी किया गया और न ही उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया गया, जबकि ऐसी टिप्पणियों का सीधा प्रभाव अधिकारी के सेवा-करियर पर पड़ सकता है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने विशेष न्यायालय के 30 अगस्त 2025 के आदेश के पैरा 60 से 62 में की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को निरस्त कर दिया।

यह टिप्पणी की थी विशेष कोर्ट ने

  • जांच में देरी और लापरवाही का आरोप:ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि मामले में समय पर आवश्यक कदम नहीं उठाए गए और जांच में अनावश्यक देरी हुई।
  • उचित कार्रवाई न करने की टिप्पणी:अदालत ने यह कहा था कि संबंधित अधिकारी ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जिससे प्रकरण कमजोर हुआ।
  • दोषसिद्धि का अवसर चूकने की टिप्पणी:ट्रायल कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि यदि समय पर और सही तरीके से कार्रवाई होती, तो अभियुक्तों की दोषसिद्धि संभव हो सकती थी।



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