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मौसम की मार के बीच सरसों की फसलों पर लाही का प्रकोप तेजी से फैल रहा है. खेतों में लाही पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर बना रही है, जिससे दाने और फलियां प्रभावित हो रही हैं. कई इलाकों में सरसों की फसल नष्ट होने की कगार पर है.
मध्य प्रदेश के सीधी जिले में इन दिनों बदले हुए मौसम ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. ठंड, कोहरा और लगातार बनी नमी का सीधा असर सरसों की फसल पर देखने को मिल रहा है. खेतों में लहलहाती सरसों की फसल अब लाही कीट की चपेट में आती नजर आ रही है. मौसम विभाग द्वारा अगले पांच दिनों तक अलर्ट जारी किए जाने के बाद किसानों की चिंता और बढ़ गई है. अनुमान है कि आने वाले दिनों में बादल छाए रहेंगे और कड़ाके की ठंड पड़ेगी. इसके अलावा वातावरण में नमी बनी रहेगी, जो लाही के प्रकोप के लिए अनुकूल मानी जाती है.
कीट पर नहीं हुआ नियंत्रण, तो गिर सकता है उत्पादन
जिले के कई इलाकों में सरसों के पौधों की कोमल टहनियों और फूलों पर लाही चिपककर रस चूस रही है. इससे पौधों की बढ़वार रुक गई है और फूल झड़ने लगे हैं. किसान सलाहकार कृष्णकांत तिवारी ने लोकल 18 को बताया कि कहीं फूल गिर रहे हैं तो कहीं दाने बनने से पहले ही पौधे कमजोर पड़ रहे हैं. यदि समय रहते इस कीट पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो सरसों के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.
लाही की वजह से मुड़ने लगती है पत्तियां
लाही के अधिक प्रकोप से सरसों की पत्तियां पीली होकर मुड़ने लगती हैं और उन पर चिपचिपा पदार्थ दिखाई देता है. इसी पर काले फफूंद का संक्रमण हो जाता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है. इसका सीधा असर दानों के विकास पर पड़ता है. दाने छोटे, सिकुड़े और कमजोर रह जाते हैं, जिससे उपज और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं.
कीट की वजह से दानों में तेल की मात्रा हो जाती है कम
कृषि वैज्ञानिक डॉ. वेद प्रकाश सिंह के अनुसार लाही के कारण सरसों की फसल में 60 से 70 प्रतिशत तक उत्पादन घट सकता है. साथ ही दानों में तेल की मात्रा भी कम हो जाती है. उन्होंने बताया कि एफिड और जेसिड जैसे रस चूसने वाले कीट दिखने में छोटे होते हैं, लेकिन फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं. बादल छाए रहने वाले मौसम में इनका प्रकोप तेजी से फैलता है, इसलिए किसानों को सतर्क रहना चाहिए.
डॉ. सिंह ने लाही नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल का 1 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी है. इसके अलावा एथियोमैथिजम 12.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से भी प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है. जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए नीम तेल, नीम की खली का अर्क, गोमूत्र और लहसुन-मिर्च के जैविक घोल को 7 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़कने की सलाह दी गई है.