पटना. बीते 15 फरवरी को कोलंबो के मैदान पर पाकिस्तान के खिलाफ ईशान किशन की धमाकेदार पारी क्रिकेट की बड़ी और ऐतिहासिक पारियों में गिनी जाती रहेगी. इसी पारी ने भारत को पाकिस्तान पर शुरुआत से ही बढ़त दिला दी जो जीत मिलने की राह आसान कर गई. यह जबरदस्त पारी इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि ईशान किशन की कमबैक की कहानी से भी जुड़ती है. दरअसल, एक वक्त ऐसा भी आया था जब ईशान किशन के लिए भारतीय टीम का दरवाजा लगभग बंद हो चुका था. 27 साल का यह लड़का जो कभी तूफानी खिलाड़ी के तौर पर पहचान बना चुका था, वह अपने बुरे दौर दौर में एक वक्त पर विकेटकीपरों की लंबी कतार में पांचवें नंबर पर खड़ा नजर आ रहा था. भारतीय क्रिकेट टीम में तब ऋषभ पंत वापस आ चुके थे. ध्रुव जुरेल कमाल दिखा रहे थे. संजू सैमसन और जितेश शर्मा भी दावेदारी पेश कर रहे थे. ईशान किशन का भी नाम चल तो रहा था, लेकिन प्लेइंग इलेवन से दूर ही रह जाते.
जब ईशान को सारे रास्ते बंद दिखने लगे
चयन क्रम में पांचवें नंबर तक फिसले
क्रिकेट के जानकार कहते है कि जब ईशान किशन का खराब फेज आया तब भारतीय टीम में विकेटकीपर बल्लेबाजों की होड़ तेज थी. ऋषभ पंत वापसी कर चुके थे, ध्रुव जुरेल घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार प्रभावित कर रहे थे. ताबड़तोड़ बल्लेबाज संजू सैमसन दावेदार बने हुए थे और जितेश शर्मा भी अपनी उपयोगिता लगातार साबित कर रहे थे. ऐसे में ईशान किशन चयन क्रम में पांचवें विकल्प तक खिसक गए थे. भारतीय क्रिकेट जगत में यह संकेत माना जाने लगा कि उनकी इंडियन क्रिकेट टीम में वापसी की राह कठिन हो गई है.
मानसिक थकान, ईशान का ब्रेक और विवाद
इसी अनिश्चितता और दबाव के बीच ईशान ने ब्रेक लेने का फैसला ले लिया. वजह मानसिक थकान बताई गई, लेकिन इसके बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया. घरेलू क्रिकेट को लेकर गंभीरता पर सवाल उठे. उनके करीबी अंशुमत श्रीवास्तव के अनुसार, लोगों ने जल्दी निष्कर्ष निकाल लिया कि ईशान किशन क्रिकेट को लेकर गंभीर नहीं हैं. लेकिन ईशान ने प्रतिक्रिया देने के बजाय चुपचाप तैयारी को चुना. वह सबके सामने मुस्कुराते रहे और लगातार मेहनत करते रहे. इसी कठिन समय में उनको पिता ने एक सलाह दी जिसे उन्होंने माना और जीवन में उतार लिया. इसी सलाह को आधार बनाकर संघर्ष किया और आगे बढ़ते गए.
ईशान किशन के पिता प्रणव पांडेय ने कहा था कि- “जो लड़का हमेशा सबके चेहरे पर मुस्कान ले आता था, वह खुद मुस्कुराना छोड़ चुका था. मैं और मेरी पत्नी अक्सर रोते थे. वह 12 साल की उम्र में क्रिकेट के लिए पटना छोड़कर रांची चला गया था और लोग कह रहे थे कि उसे भारत के लिए खेलने में कोई दिलचस्पी नहीं है. उन मीम्स को देखना बहुत दर्दनाक था.”
पिता की सलाह, भगवद गीता से मिली दिशा
दरअसल, इस मुश्किल घड़ी में पिता प्रणव पांडेय ने उन्हें भगवद गीता पढ़ने की सलाह दी. उन्होंने कहा- भगवद गीता पढ़ो बेटा! मेरी मां ने मुझे यही सलाह दी थी. जब तनाव हो, सवाल मन में रखो और गीता खोलो. जो पेज आएगा उसमें जवाब मिल जाएगा. ईशान ने पिता की बात को सुना और समझा. एक छोटी सी पॉकेट गीता मंगवाई. गीता के श्लोकों ने उन्हें सिखाया- कर्म करो, फल की चिंता मत करो. ईशान ने इसे जिया और ध्यान शुरू किया. अपनी एकाग्रता बढ़ाई और मानसिक स्पष्टता को प्राथमिकता दी. करीबी लोगों का कहना है कि गीता पढ़ने से उन्हें वर्तमान में जीने की प्रेरणा मिली. उन्होंने लक्ष्य से पहले प्रक्रिया को महत्व देना शुरू किया और यही परिवर्तन आगे चलकर उनके खेल में दिखा.
दिनचर्या में बदलाव, अकादमी में दो सत्र
ईशान किशन के करीबी लोगों का कहना है कि भगवद गीता पढ़ने से उन्हें वर्तमान में जीने की प्रेरणा मिली. उन्होंने लक्ष्य से पहले प्रक्रिया को महत्व देना शुरू किया. यही बदलाव आगे चलकर उनके खेल में दिखा.
पाकिस्तान मैच की पारी और बदल गई धारणा
उम्मीदों से नहीं, प्रक्रिया से बनाया कर्म का रिश्ता
गीता के श्लोकों में कर्म पर जोर और फल की चिंता छोड़ने का संदेश है. ईशान ने इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया. आज ईशान फिर नंबर वन विकल्प की बात हो रही है. यह सिर्फ बल्ले की कहानी नहीं. यह पिता की सलाह, परिवार के साथ, गीता के श्लोकों और उस लड़के की हिम्मत की कहानी है, जिसने टूटने के बजाय खुद को संवारा. क्योंकि गीता कहती है-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. बस कर्म करो… बाकी ईश्वर देख लेंगे!