भोपाल में आयोजित इंडियन मेनोपॉज सोसायटी के राष्ट्रीय सम्मेलन IMSCON-26 में जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने सभी को चौंका दिया। विशेषज्ञों ने साफ कहा कि ब्रेस्ट कैंसर अब सिर्फ 40-50 साल की महिलाओं की बीमारी नहीं रह गया है। अब 24 साल की युवतियां भी इसकी चपेट में आ रही हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जहां 90 प्रतिशत महिलाओं की नियमित स्क्रीनिंग होनी चाहिए, वहां देश में 3 प्रतिशत से भी कम महिलाएं जांच करवा रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते जांच और वैक्सीनेशन शुरू नहीं किया गया तो आने वाले सालों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। सम्मेलन का उद्घाटन इंडियन मेनोपॉज सोसायटी की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनीता शाह, डॉ. सुधा शर्मा, डॉ. शशि श्रीवास्तव, डॉ. वैजयंती, डॉ. मनीषा खरे, डॉ. श्रद्धा अग्रवाल और अन्य पदाधिकारियों की उपस्थिति में हुआ। इस दौरान घोषणा की गई कि आगरा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आरती गुप्ता इंडियन मेनोपॉज सोसायटी की अगली राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगी। 24 साल की उम्र में ब्रेस्ट कैंसर की वजह अहमदाबाद से आईं सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अंजना चौहान ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र की लड़कियों में ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसकी बड़ी वजह बिगड़ती लाइफस्टाइल है। जंक फूड, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, देर रात तक जागना, तनाव और हार्मोनल असंतुलन ये सभी मिलकर शरीर पर असर डालते हैं। पहले जहां ब्रेस्ट कैंसर ज्यादातर 45 साल के बाद देखा जाता था, अब 20 से 30 साल की उम्र में भी केस सामने आ रहे हैं। कम उम्र में बीमारी ज्यादा आक्रामक होती है, इसलिए समय पर पहचान बेहद जरूरी है। 90% स्क्रीनिंग जरूरी, लेकिन आंकड़े डराने वाले डॉ. चौहान ने साफ कहा कि अगर हम ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर से मौतें कम करना चाहते हैं तो कम से कम 90 प्रतिशत महिलाओं की नियमित स्क्रीनिंग जरूरी है। लेकिन हकीकत यह है कि देश में 3 प्रतिशत से भी कम महिलाएं स्क्रीनिंग करवाती हैं। गांवों में तो जागरूकता की कमी है ही, शहरों में भी महिलाएं शर्म, डर या लापरवाही के कारण जांच टाल देती हैं। कई बार परिवार भी इसे गंभीरता से नहीं लेता। डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती स्टेज में पकड़ा गया कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है, लेकिन देर होने पर इलाज मुश्किल और महंगा हो जाता है। सर्वाइकल कैंसर को लेकर भी विशेषज्ञों ने चिंता जताई। डॉ. चौहान ने बताया कि यह कैंसर एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) संक्रमण से होता है। यह वायरस कई सालों तक शरीर में बिना लक्षण के रह सकता है और बाद में कैंसर का रूप ले लेता है। उन्होंने बताया कि 28 फरवरी से शुरू हो रहा एचपीवी वैक्सीनेशन अभियान बड़ी पहल है। अगर 14 साल की लड़कियों को समय पर वैक्सीन लग जाए तो भविष्य में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में भारी कमी लाई जा सकती है। फिलहाल वैक्सीनेशन का प्रतिशत भी काफी कम है, लेकिन इस नई पहल से इसमें सुधार की उम्मीद है। पहला लाइव टेलीकास्ट: डॉक्टर ने ओपीडी से की रोबोटिक सर्जरी HER अस्पताल में आयोजित सर्जिकल वर्कशॉप के दौरान प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया भावे चित्तावर ने अपनी ओपीडी से बैठकर टेलीरोबोटिक सर्जरी की। डॉ. प्रिया अपनी ओपीडी में मंतरासन चेयर पर बैठीं और वीआर गॉगल्स पहनकर रोबोटिक सिस्टम से जुड़ीं। दूसरी ओर मरीज ऑपरेशन थिएटर में था। रोबोटिक तकनीक ने दोनों के बीच की दूरी खत्म कर दी। डॉक्टर के हाथों की हर मूवमेंट रोबोट के जरिए सीधे मरीज तक पहुंच रही थी। करीब एक घंटे चली इस सर्जरी में बच्चेदानी (यूटरस) को सफलतापूर्वक निकाला गया। इस दौरान आए विशेषज्ञों ने लाइव प्रक्रिया देखी और नई तकनीक की बारीकियां समझीं। मेनोपॉज के बाद दोगुना खतरा आगरा से आईं वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आरती गुप्ता ने मेनोपॉज के बाद महिलाओं की सेहत पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि मेनोपॉज के बाद महिलाओं में हड्डियां तेजी से कमजोर होने लगती हैं। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा लगभग दोगुना होता है। उन्होंने समझाया कि मेनोपॉज के समय शरीर में एस्ट्रोजेन हार्मोन कम हो जाता है। यही हार्मोन हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है। जब यह घटता है तो बोन डेंसिटी तेजी से गिरती है और 60-70 साल की उम्र में फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।
बचपन से रखें हड्डियों का ध्यान डॉ. गुप्ता ने कहा कि मजबूत हड्डियों की नींव बचपन में ही पड़ती है। जिसे ‘पीक बोन मास’ कहा जाता है। अगर बचपन में पर्याप्त खेलकूद, कैल्शियम और विटामिन डी नहीं मिलेगा तो आगे चलकर समस्या बढ़ेगी। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों को रोज कम से कम एक घंटा खेलना चाहिए और आधा घंटा धूप में जरूर रहना चाहिए। खासकर शहरों में बच्चे ज्यादातर समय घर के अंदर या मोबाइल पर बिताते हैं, जिससे विटामिन डी की कमी बढ़ रही है। एस्ट्रोजेन की कमी और बढ़ता संक्रमण मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजेन कम होने से सिर्फ हड्डियां ही नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रजनन अंग भी प्रभावित होते हैं। वैजाइना की परत पतली हो जाती है, जिससे इंफेक्शन और सूखापन की समस्या बढ़ती है। कई महिलाएं इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन समय रहते इलाज जरूरी है। विटामिन की कमी भी बड़ी वजह विशेषज्ञों ने बताया कि विटामिन डी और बी12 की कमी भी तेजी से बढ़ रही है। खासकर वे महिलाएं जो धूप में कम निकलती हैं या पूरी तरह शाकाहारी हैं, उनमें यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है। इसके कारण कमजोरी, थकान और हड्डियों में दर्द आम हो गया है। आम जनता के लिए भी मौका 1 मार्च को पब्लिक फोरम का आयोजन किया गया है, जिसमें आम लोग भी विशेषज्ञों से सवाल पूछ सकेंगे। मैमोग्राफी और सर्वाइकल कैंसर जांच के लिए रियायती कूपन भी दिए जाएंगे, ताकि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं जांच करवा सकें।
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