होली पर मेहमान आएं तो जरूर परोसें ये लच्छेदार मठरी, 25 दिन तक नहीं होती खराब, जानें सीक्रे

होली पर मेहमान आएं तो जरूर परोसें ये लच्छेदार मठरी, 25 दिन तक नहीं होती खराब, जानें सीक्रे


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होली पर मेहमान आएं तो जरूर परोसें ये लच्छेदार मठरी, 25 दिन तक नहीं होती खराब

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मध्य प्रदेश के सतना और बघेलखण्ड अंचल में लच्छेदार मठरी सिर्फ एक नमकीन नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है. त्योहारों पर घर-घर बनने वाली यह खस्ता और परतदार मठरी 20 से 25 दिनों तक सुरक्षित रखी जा सकती है. सही मोयन, साटा की परत और धीमी आंच पर तलने की विधि ही इसे खास बनाती है. चाय के साथ परोसी जाने वाली यह पारंपरिक रेसिपी मेहमाननवाजी का स्वाद कई गुना बढ़ा देती है.

सतना. त्योहार आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट और पकवानों की तैयारियां तेज हो जाती हैं. ऐसे में अगर रसोई से खस्ता और परतदार लच्छेदार मठरी की खुशबू उठे तो माहौल और भी खास बन जाता है. बघेलखण्ड अंचल में यह मठरी सिर्फ एक नमकीन नहीं बल्कि परंपरा और आत्मीयता का प्रतीक मानी जाती है. चाय की चुस्कियों के साथ परोसी जाने वाली यह लच्छेदार मठरी मेहमानों के स्वागत का अहम हिस्सा बन चुकी है. खास बात यह है कि इसे एक बार बनाकर 20 से 25 दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे त्योहारों के दौरान बार-बार पकाने की जरूरत नहीं पड़ती.

लोकल 18 से बातचीत में उर्मिला मिश्रा ने बताया कि लच्छेदार मठरी बनाने की विधि जितनी सरल दिखती है उतनी ही सावधानी भी मांगती है. उन्होंने कहा कि सही अनुपात में मोयन और धीमी आंच पर तलने की प्रक्रिया ही इसे खस्ता और परतदार बनाती है. उनके अनुसार मैदा, घी या तेल, अजवाइन, नमक और वैकल्पिक रूप से कसूरी मेथी इस पारंपरिक व्यंजन की मुख्य सामग्री हैं. परतों के लिए तैयार किया जाने वाला मैदा और घी का मिश्रण यानी साटा इस रेसिपी की खास पहचान है.

लच्छेदार मठरी बनाने की विधि
सबसे पहले एक बड़े बर्तन में मैदा लेकर उसमें नमक, मसलकर डाली गई अजवाइन और कसूरी मेथी मिलाई जाती है. इसके बाद घी या तेल डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता है. मोयन इतना होना चाहिए कि मुट्ठी बांधने पर मैदा बंध जाए. फिर थोड़ा-थोड़ा पानी डालते हुए सख्त आटा गूंथकर उसे 10 से 15 मिनट तक ढककर रखा जाता है. इसके बाद आटे की बराबर आकार की लोइयां बनाई जाती हैं. हर लोई को पतला बेलकर उस पर साटा अच्छी तरह लगाया जाता है. फिर उसे कसकर रोल किया जाता है और छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है. इन टुकड़ों को हल्का दबाकर दोबारा बेलने से परतदार आकार तैयार होता है.

धीमी आंच पर तलें
उर्मिला बताती हैं कि लच्छेदार मठरी की असली पहचान उसके तलने के तरीके में छिपी होती है. कढ़ाई में तेल हल्का गर्म होना चाहिए, बहुत तेज नही क्योंकि मठरियों को हमेशा धीमी आंच पर तलना चाहिए ताकि वे धीरे-धीरे फूलें और उनकी परतें खुलकर सामने आएं. तेज आंच पर तलने से मठरी बाहर से लाल दिखेगी लेकिन अंदर से कच्ची रह सकती है. आमतौर पर सुनहरा होने में 10 से 12 मिनट का समय लगता है. तलने के बाद मठरियों को टिश्यू पेपर पर निकालकर पूरी तरह ठंडा किया जाता है. ठंडा होने के बाद इन्हें एयरटाइट डिब्बे में भरकर रखा जाए तो यह लंबे समय तक कुरकुरी बनी रहती हैं.

सही संतुलन और धैर्य से मिलता है परफेक्ट स्वाद
मोयन कम होने पर मठरी सख्त हो सकती है जबकि ज्यादा होने पर टूट सकती है. साटा की परत ठीक से लगाने से ही लच्छेदार बनावट आती है. त्योहारों में जब घर मेहमानों से भरा हो तब यह पारंपरिक मठरी चाय के साथ परोसकर मेहमाननवाजी का स्वाद और भी बढ़ाया जा सकता है. बघेलखण्ड की यह रेसिपी न सिर्फ स्वाद में लाजवाब है बल्कि परंपरा को सहेजने का एक सरल और प्रभावी तरीका भी है.

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Dallu Slathia

Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें



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