रंग पंचमी पर यहां बिना श्रीराम के माता सीता की पूजा, त्रेतायुग से लग रहा मेला! जानें कहां

रंग पंचमी पर यहां बिना श्रीराम के माता सीता की पूजा, त्रेतायुग से लग रहा मेला! जानें कहां


Sagar News: बुंदेलखंड और चंबल की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र करीला धाम का विश्व प्रसिद्ध मेला रंग पंचमी पर लगा है. हर साल की तरह इस साल भी यहां पर लाखों श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है. यहां बुंदेलखंड, चंबल, यूपी, राजस्थान के अलावा विदेश से भी श्रद्धालु रंग पंचमी पर माता के दर्शन करने पहुंचते हैं. उस हिसाब से ही जिला प्रशासन ने तैयारी की है. 7 मार्च से शुरू होकर 9 मार्च तक यह मेला चलेगा.

मान्यता है कि रंग पंचमी के दिन मां जानकी और यहां पर स्थित गुफा के दर्शन करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है. मन्नत पूरी होने के बाद यहां पर बधाई करने की परंपरा है. रंग पंचमी पर यहां पर हजारों नृत्यांगनाओं के द्वारा राई बधाई के प्रस्तुति दी जाती है. दूसरा जो श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं वह उनके लिए बधाई देकर जाते हैं.

बिना श्रीराम के यहां जानकी जी की पूजा
करीला धाम में मां जानकी का ऐसा ऐतिहासिक दिव्य भव्य मंदिर है, जहां माता अपने दोनों पुत्र लव कुश और ऋषि वाल्मीकि जी के साथ विराजमान हैं. यहां भगवान राम के बिना ही माता जानकी की पूजा होती है. यह मंदिर अशोकनगर जिले में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. इस पहाड़ी के चारों तरफ नीचे भव्य मेला लगता है.

संजय दत्त भी करवा चुके बधाई
करीला धाम में मन्नत पूरी होने के बाद नृत्यांगनाओं द्वारा राई बधाई कराया जाता है. यह परंपरा सदियों से चली जा रही है. खासतौर पर जब किसी के यहां बच्चा होता है तब बधाई करवाई जाती है. रंग पंचमी के दिन बधाई करवाने का विशेष महत्व है. यहां पर बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता संजय दत्त भी बधाई करवा चुके हैं.

राई नृत्य और मेले को लेकर बड़ी मान्यता
मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम ने माता सीता का परित्याग कर दिया था और वन में माता ने लव-कुश को जन्म दिया था, वह जगह करीला धाम ही है. लेकिन, माता को जब सोच हुआ कि अगर वह अयोध्या में होती तो उनके बच्चों का जन्म उत्सव धूमधाम से मनाया जाता, तब ऋषि वाल्मीकि जी ने मां के मन की बात जान ली. स्वर्ग से अप्सराओं का आह्वान किया. तब इंद्र की सभा में नृत्य करने वाली अप्सराएं धरती पर आईं और लव-कुश के जन्म उत्सव पर रात भर बधाई की. जब सुबह माता से विदाई मांगने लगीं तो उनके पास ज्यादा कुछ नहीं था, तब अप्सराओं ने वरदान मांगा था कि जब तक पृथ्वी रहे तब तक उनका यह नृत्य होता रहे, इसलिए आज भी रंग पंचमी पर त्रेता युग से जो परंपरा शुरू हुई थी, वह चल रही है. हर साल करीला धाम में लाखों लोग पहुंचते हैं. यह भी माना जाता है कि यहीं से राई बुंदेलखंड का नृत्य बना जो काफी लोकप्रिय है.

गुफा से भभूत लेने की परंपरा 
मान्यता है कि त्रेता युग में माता सीता ने लव-कुश को जिस गुफा में जन्म दिया था, वह अशोकनगर की पहाड़ी पर है. यह गुफा साल भर में केवल एक दिन के लिए रंग पंचमी को खुलती है. सबसे पहले यहां के पुजारी द्वारा गुफा का पूजन किया जाता है. फिर गुफा 24 घंटे तक खुली रखते हैं. यहां लाखों श्रद्धालु माता जानकी मंदिर के साथ इस गुफा के दर्शन करते हैं. गुफा में जो अग्नि प्रज्जवलित है, उसकी भभूत को लोग अपने साथ घर ले जाते हैं. परिजनों को खिलाते हैं. खेतों में डालते हैं, जिसकी वजह से अच्छी फसल होती है.

मंदिर की लोकेशन
करीला माता का मंदिर अशोकनगर से 30 किलोमीटर दूर, मुंगावली से 35 किलोमीटर दूर, गुना से 75 किलोमीटर, विदिशा से 80 किलोमीटर, सागर से 140 किलोमीटर दूर है. इस क्षेत्र में जाने के लिए बस और ट्रेन दोनों की सुविधा है.



Source link