क्या आपको मालूम है कि क्रिकेट में आमतौर पर जो चौका लगाया जाता है, उसमें गेंद दनदनाते हुए कुछ सेकेंड में बाउंड्री को टच कर रही होती है. तब गेंद बल्ले से 120 किमी प्रति घंटा की स्पीड से निकलती है. अगर तूफानी छक्का लग रहा है तो गेंद में 140 की स्पीड से बाउंड्री को पार करती है. ये शाट्स इतनी तेज गति से लगते हैं कि हर कोई हैरान हो सकता है कि इनमें इतनी रफ्तार आती कैसे है और कैसे इस तरह के दनदनाते शाट्स लगते हैं. इन शाट्स का साइंस आखिर क्या है.
वैसे आपको बता दें कि क्रिकेट में बल्लेबाज के बल्ले से निकलने वाले छक्के यानि सिक्सर और चौके यानि फोर एक दिलचस्प फिजिक्स का परिणाम है. यानि ये सबकुछ खेल के साथ साथ साइंस भी है. ये सभी शॉट्स बल्ले और गेंद की टक्कर से पैदा होते हैं और फिर इनकी स्पीड ही नहीं बढ़ती बल्कि इनमें ताकत, प्रोजेक्शन मोशन और मोमेंट सबकुछ होता है. अगर ये बताना कुछ जटिल लग रहा है तो इसे आसान शब्दों में समझते हैं.
क्या है बल्ला-गेंद टक्कर का विज्ञान
जब गेंद बल्ले से टकराती है, तो ये अलग तरह की टक्कर होती है. इस पर गेंद पहले कुछ असहज होती है. पहले थोड़ी सिकुड़ती है और फिर फैलती है, जिससे ऊर्जा का कुछ हिस्सा गर्मी और ध्वनि में खो जाता है.
अगर बल्ला स्थिर हो और गेंद 100 km/h की स्पीड से आए तो वह बल्ले से 20 km/h की स्पीड से उछलकर वापस आएगी लेकिन जब बल्लेबाज बल्ला घुमाता है, तो स्पीड बढ़ जाती है. स्पीड के फॉर्मूला बताता है कि अगर गेंद 100 km/h से आ रही हो, बल्ले की स्पीड 60 km/h हो, तो फिर जिस स्पीड से बल्ले से छूटेगी वो 92 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास होगी.
सबसे अच्छा शाट यानि स्पीड वाला तेज शाट तब निकलता है जबकि गेंद बल्ले के बीच वाले हिस्से से टकराकर निकले. मध्य भाग से टकराने पर कंपन कम होता है और अधिकतम ऊर्जा ट्रांसफर होती है.
क्या होती है शॉट्स की स्पीड
चौकों के लिए बल्ले से निकली हुई स्पीड 100-120 किमी प्रति घंटा होती है. गेंद कम ऊंचाई पर और सीधी लाइन में जाती है, जो बाउंड्री यानि 60-70 मीटर तक पहुंचने के लिए काफी होती है.
छक्कों के लिए बल्ले से निकली गति 120-140 km/h या इससे ज्यादा होनी चाहिए. औसत छक्के के लिए 130 km/h अनुमानित है. कुछ बड़े छक्कों में 138 किमी प्रति घंटा तक की स्पीड देखी गई.
प्रोफेशनल बल्लेबाज आमतौर पर 70-90 किमी घंटा की स्पीड से बैट घुमाते हैं. महेंद्र सिंह धोनी आमतौर पर 134 किमी प्रति घंटा की स्पीड से छक्का मारते थे. छक्के के लिए अगर गेंद बैट से 30-40 डिग्री का घुमाव लेते हुए निकले तो पक्के तौर पर छक्का जा सकता है. ग्रेविटी के कारण गेंद की पैराबोलिक ट्रैजेक्टरी बनती है, और हाई स्पीड + सही एंगल से यह बाउंड्री पार हो जाती है.
क्रिकेट में शाट्स, बल्ले के घूमने की गति और गेंद की रफ्तार को लेकर काफी रिसर्च हुए हैं. ऑस्ट्रेलियन फिजिसिस्ट रॉड क्रॉस ने बल्ला-गेंद टक्कर पर प्रयोग किए, जहां उन्होंने पाया कि स्थिर बल्ले पर लगकर 100 की स्पीड की गेंद 20 की स्पीड से उछलती है. स्वीट स्पॉट पर टकराने पर गेंद ज्यादा स्पीड से बल्ले से निकलती है.
कुछ बल्लेबाज क्यों आसानी से छक्के लगा लेते हैं?
अच्छे बल्लेबाज जैसे रोहित शर्मा या एबी डिविलियर्स हाई बैट स्पीड यानि 80 किमी घंटा की स्पीड से बल्ला घुमाते हैं वे बॉडी रोटेशन और कलाई के फ्लिक से ज्यादा पावर जनरेट करते हैं.
– फिर आधुनिक बल्ले हल्के, बड़े स्वीट स्पॉट वाले और ज्यादा विलो वाले होते हैं, जो ऊर्जा ट्रांसफर बढ़ाते हैं. टी20 क्रिकेट में छोटे हैंडल-लॉन्ग ब्लेड डिजाइन आम हैं.
– स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से कोर मसल्स मजबूत होते हैं, जो ज्यादा मोमेंटम देते हैं। रिसर्च दिखाती है कि 1 किमी प्रति घंटा की बैट स्पीड बढ़ने से गेंद को 4-6 फीट की ज्यादा दूरी मिलती है.
– वे गेंद की लाइन पढ़कर सही एंगल चुनते हैं, जिससे कम प्रयास में ज्यादा पावर आती है. आजकल बड़े बल्ले और फिटनेस ने छक्के “आसान” बना दिए हैं.
क्या विवियन रिचर्ड्स सबसे आसानी से छक्के लगाते थे
– विवियन रिचर्ड्स में अद्भुत प्राकृतिक प्रतिभा का कम्बिनेशन था. असाधारण रिफ्लेक्सेस और आई-हैंड कोऑर्डिनेशन. इमरान खान ने खुद कहा है कि विवियन को सबसे अलग बनाता था उनका रिफ्लेक्स, वे गेंद की लेंथ और लाइन को इतनी जल्दी पढ़ लेते थे कि वे पहले ही परफेक्ट पोजीशन में पहुंच जाते थे. इससे उन्हें बल्ला घुमाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी.
– विवियन का पहला विचार हमेशा अटैक करना होता था. वे कहते थे, पहली चीज ये है कि एग्रेसन थिंक करें. यह मानसिकता उन्हें डिफेंसिव नहीं होने देती थी. वे गेंदबाज पर दबाव बनाते थे.
– उनके शॉट्स में टाइमिंग और पॉवर का अनोखा मिश्रण था. वे कलाई और कंधों के घुमाव से इतनी पावर जनरेट करते थे कि गेंद बाउंड्री पार कर जाती थी बिना ज्यादा बल लगाए. उनका स्टांस बॉक्सर या टेनिस प्लेयर जैसा था. उससे वे गेंद पर पूरी तरह एक्सेस पाते थे. वे फ्रंट फुट पर पुल भी खेल लेते थे, जो बहुत कम लोग कर पाते थे.
– उनके पास नेचुरल पॉवर थी. वे बैट को लास्ट मोमेंट में उठाते थे, जिससे स्पीड और कंट्रोल दोनों मिलते थे. उनकी टेक्नीक इतनी क्लीन थी कि छक्के बिना ज्यादा कोशिश के लगते थे.
क्या हवा में ऊपर मारकर ट्रेजेक्ट्री बनाने से ज्यादा छक्के
नहीं, गेंद को हवा में ज्यादा ऊपर से ट्रेजेक्ट्री बनाने पर छक्के ज्यादा नहीं लगते बल्कि ज्यादातर मामलों में यह कम प्रभावी होता है. छक्के लगाने के लिए गेंद के बल्ले से निकलने का कोण का एक ऑप्टिमल रेंज होता है, जो बहुत ज्यादा ऊंचा होने पर दूरी कम हो जाती है.
क्रिकेट में छक्कों के लिए ऑप्टिमल लांच एंगल क्या
– 30° से 40° के बीच सबसे अच्छा माना जाता है।
– क्रिकेट आस्ट्रेलिया की की स्टडी मानती है कि छक्कों के लिए ऑप्टिमल एंगल 37° के आसपास.
– 35° पर 105 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से मारने पर गेंद आराम से 65मीटर बाउंड्री क्लियर होकर छक्का हो सकती है
– बहुत ज्यादा ऊंचा एंगल होने पर गेंद ज्यादा ऊपर जाती है, लेकिन हवा में ज्यादा समय बिताने से लंबा नहीं जा पाती, बीच में ही गिर जाती है और कैच हो सकता है.
– बहुत कम एंगल 20° से नीचे होने पर गेंद ज्यादा दूर जाती है लेकिन ग्राउंड पर गिर सकती है, यानि ऐसे में फोर तो बन सकता है लेकिन छक्का नहीं.
रोहित शर्मा या क्रिस गेल के बड़े छक्के अक्सर 30-38° के आसपास होते हैं, वो फ्लैट नहीं लगते और ऊंचाई वाले भी.