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Ujjain News: उज्जैन को भारत का ग्रीनविच क्यों कहा जाता है, जानिए इसकी पूरी कहानी. 21 मार्च को दिन और रात बराबर क्यों होते हैं, इसके पीछे का विज्ञान समझिए. उज्जैन की जीवाजी वेधशाला में कैसे सदियों पहले समय की सटीक गणना की जाती थी, यह जानना बेहद दिलचस्प है. महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा बनाई गई यह वेधशाला आज भी खगोल विज्ञान का बड़ा केंद्र है. पढ़िए उज्जैन के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व की पूरी कहानी आसान भाषा में.
MP News: मध्य प्रदेश का उज्जैन सिर्फ धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और समय गणना का भी बड़ा केंद्र रहा है. प्राचीन समय में विद्वानों ने इसे पृथ्वी और आकाश के बीच संतुलन बिंदु माना था. यही वजह है कि इसे कभी भारत का “ग्रीनविच” कहा जाता था. करीब चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से ही यहां समय की सटीक गणना की जाती थी. ग्रह-नक्षत्रों की चाल से लेकर सूर्य और चंद्र ग्रहण तक, सबका अध्ययन यहीं से होता था.
क्यों होते हैं दिन-रात बराबर?
21 मार्च के आसपास एक खास खगोलीय घटना होती है, जिसे विषुव (Equinox) कहा जाता है. इस दिन पृथ्वी पर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं. इसके बाद सूर्य धीरे-धीरे उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है और उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है. यही कारण है कि: दिन बड़े होने लगते हैं, रातें छोटी होने लगती हैं, गर्मी का असर बढ़ने लगता है, यह सिलसिला 21 जून तक चलता है, जब साल का सबसे लंबा दिन होता है.
वेधशाला में कैसे होता था अध्ययन?
उज्जैन की जीवाजी वेधशाला इस खगोलीय अध्ययन का सबसे बड़ा केंद्र रही है. यहां शंकु यंत्र और नाड़ी वलय यंत्र जैसे उपकरणों से सूर्य की स्थिति और समय का सटीक हिसाब लगाया जाता था. आज भी यहां 21 मार्च को इस खास घटना को लाइव देखा जा सकता है.
300 साल पुरानी वैज्ञानिक विरासत
इस वेधशाला का निर्माण महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1733 में करवाया था. उस समय यह भारत के सबसे बड़े खगोलीय केंद्रों में से एक थी. वैज्ञानिक मानते हैं कि उज्जैन से होकर गुजरने वाली देशांतर रेखा इसे और खास बनाती है, जिससे यहां समय और ग्रहों की गणना बेहद सटीक होती थी.
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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें