जहां जानवर पी रहे पानी, उसे ही पी रहे ग्रामीण: बड़वानी के गांवों में भीषण जलसंकट, PHE के EE का दावा- कोई समस्या नहीं – Barwani News

जहां जानवर पी रहे पानी, उसे ही पी रहे ग्रामीण:  बड़वानी के गांवों में भीषण जलसंकट, PHE के EE का दावा- कोई समस्या नहीं – Barwani News




‘नालों के किनारे गड्ढे खोदकर उसमें रिसकर आने वाला गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। जहां से जानवर पानी पी रहे हैं, वहीं पानी हम पी रहे हैं। जिस पानी से हाथ भी नहीं धोया जा सकता, वही पानी यहां के लोग छान-छानकर पी रहे हैं।’ इतना कहते ही बड़वानी के पाटी विकास खंड के पीपरकुंड गांव के निवासी लाला सस्ते का चेहरा गुस्से से तमतमा जाता है। वे कहते हैं गर्मी में हालत बेहद खराब हैं। ग्राम पंचायत पीपरकुंड के कंजिया फलियां के हालात और भी ज्याजा खराब हैं। जनसुनवाई में भी गुहार लगा चुके हैं। जनप्रतिनिधियों को भी आवेदन दे चुके हैं। मगर समस्या का कोई समाधान नहीं निकला अभी गर्मी की शुरुआत है आने वाले दिनों में तो और ज्यादा दिक्कत झेलनी पड़ेगी। अब सरकारी अफसर का दावा पढ़ लीजिए पीएचई विभाग के कार्यपालन यंत्री आरएस बामनिया का दावा है कि पीपरकुंड ग्राम पंचायत में पर्याप्त पानी की व्यवस्था है। नल कूप के माध्यम से उन्हें पानी मिल रहा है। और 20 मीटर से 100 मीटर चलकर जाना पड़ रहा है मगर पानी की कोई समस्या नहीं है। अगर सरकारी दावा ऐसा है तो क्या जो लोग जलसंकट से जूझ रहे हैं, वे झूठ बोल रहे हैं या गलत जानकारी दे रहे हैं। इसी हकीकत को जानने दैनिक भास्कर की टीम हकीकत जानने ग्राउंड जीरो पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… गांव के हालात बेहद खराब मौके पर पहुंची टीम ने चौंकाने वाली तस्वीरें देखीं। कुंडिया फलिया में छोटी बच्चियां कुएं में उतरकर गंदा पानी भरती नजर आईं। इस पानी की गुणवत्ता इतनी खराब है कि इससे हाथ धोना भी मुश्किल है, फिर भी मजबूरी में इसे पीना पड़ रहा है। कंजानिया फलिया में भी बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं खतरनाक रास्तों से पानी ढोते दिखे। गर्मी बढ़ने के साथ ही ग्रामीणों को पानी की गंभीर किल्लत हो रही है। हालात इतने खराब हैं कि लोग सूखे कुओं, नदियों और नालों के किनारे गड्ढे खोदकर रिसने वाला गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। खबर में आगे बढ़ने से पहले तस्वीरें देख लीजिए… चिंताजनक स्थिति ग्राम पंचायत पीपरकुंड के कुंडिया फलिया और कंजानिया फलिया में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। इन आदिवासी बहुल इलाकों में न तो एक भी हैंडपंप है और न ही कोई वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध है। सरकारी नल जल योजना का लाभ भी यहां के निवासियों को नहीं मिल पा रहा है।
पानी की कमी के कारण ग्रामीण स्वयं कुओं, नालों और नदियों के किनारे गड्ढे खोदते हैं। इन गड्ढों से रिसने वाले गंदे पानी को छानकर वे अपनी प्यास बुझाते हैं। यह पानी न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है, बल्कि मानवीय गरिमा के भी खिलाफ है।
कुंडिया फलिया और कंजानिया फलिया के लोग आज भी स्वच्छ पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलकर खच्चरों के सहारे या सिर पर घड़े रखकर पानी लाना पड़ता है। पाटी विकासखंड के इस दूरस्थ क्षेत्र में पानी के लिए यह दैनिक संघर्ष जारी है। शुद्ध पेयजल के लिए तरस गए
ग्रामीण चंपालाल पिस्ता का कहना है कि कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से गुहार लगाई गई। जन सुनवाई में आवेदन निवेदन किए लेकिन आज तक शुद्ध पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई। गांव में एक भी हैंडपंप तक नहीं है। सरकारी योजनाओं के दावे अपनी जगह हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यहां के लोग आज भी बुनियादी जरूरत पानीके लिए संघर्ष कर रहे है
अब बड़ा सवाल यह है…क्या प्रशासन इन ग्रामीणों तक स्वच्छ पानी पहुंचा पाएगा। या फिर ये लोग आने वाले समय में भी इसी तरह प्यास से जूझते रहेंगे। सूखे नालों और तालाबों के किनारे कई झिरियां
ग्रामीण सुनील ने बताया कि पानी की इस भयावह स्थिति ने इन ग्रामीणों की दिनचर्या ही बदल दी है। गांवों के बाहर, सूखे नालों और तालाबों के किनारे कई झिरियां खुदी हुई नजर आती हैं। इन झिरियों से पानी भरने के लिए ग्रामीणों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को घंटों इंतज़ार करना पड़ता है। कुंडिया फलियां में तो स्थिति और भी गंभीर है। कई घरों की बस्ती होने के बावजूद आज तक यहां पीने के पानी के लिए कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई है। यहां के लोग मीलों दूर जाकर पानी लाते हैं, जिससे उनका पूरा दिन पानी लाने और ढोने में ही गुजर जाता है। पानी छीन लेता है रोजी-रोटी ग्रामीण भाईसीह सस्ते ने बताया कि उन्हें रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है, लेकिन गर्मी के मौसम में जब पानी की किल्लत चरम पर होती है, तब उन्हें पानी के इंतजाम में ही दिनभर की मेहनत झोंकनी पड़ती है। पानी के लिए रोजी-रोटी तक छोड़नी पड़ रही है। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार पंचायत को आवेदन दिया गया, लेकिन आज तक कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। चुनाव से पहले नेता करते हैं वादे सुरमई नामक एक ग्रामीण महिला ने बताया कि हर चुनाव के समय नेता आदिवासियों के उत्थान और विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है, वैसे ही वे इन गांवों की तरफ देखना भी बंद कर देते हैं। सुरमई का कहना है कि पाटी विकासखंड के पीपरकुंड ग्राम पंचायत के कई फलिया और गांव इन नेताओं के खोखले वादों की सच्चाई उजागर करने के लिए काफी हैं।



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