रीवा. कुंदन कुंवारी की वीरता और पराक्रम के साथ ही रीवा राज्य के सैनिकों की बहादुरी की वजह से इस राज्य ने नैकहाई का युद्ध जीता था, यह युद्ध काफी चर्चित माना जाता है. महरानी कुंदन कुंवारी ने कहा कि अगर आप लोगों को जंग लड़ना है तो पान लीजिये और तलवारे उठाईये नहीं तो मैं जा रही हूं युद्ध लड़ने. महारानी का साहस व जोश देखकर रीवा के सैनिकों में युद्ध का जूनून आ गया और फिर युद्ध भी हुआ. महारानी को आज भी रीवा के लोग लक्ष्मीबाई की उपाधि देते हैं.
मराठों की दस हजार सेना से रीवा राज्य के 200 सैनिकों ने भयंकर युद्ध लड़कर जीत हासिल की थी. इस लड़ाई में मारे गए 30 वीर योद्धाओं की छतरियां आज भी यहां मौजूद हैं जो उनकी वीरता की याद दिलाती हैं. रीवा में महारानी कुंदन कुंवारी की वीरता और पराक्रम के साथ ही रीवा राज्य के सैनिकों की बहादुरी की वजह से इस राज्य ने नैकहाई का युद्ध जीता था, यह युद्ध काफी चर्चित माना जाता है.
क्या है पूरा इतिहास
वैसे तो हिंदुस्तान में कई ऐसी महारानियां हुईं जिन्होंने अपनी आन-बान और शान के लिए लड़ाइयां लड़ीं और दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए. रीवा के इतिहास में एक ऐसा ही अमर नाम राजा अजीत सिंह की वीरांगना रानी कुंदन कुंवारी का है, जो घुड़सवारी एवं तलवारबाजी में काफी माहिर थीं. कुंदन कुंवारी का विवाह राजा अजीत सिंह से 1758 ई. में हुआ था. सन् 1796 में जब मराठा अली बहादुर की सेना 10 हजार सैनिकों के साथ रीवा में घुस आई तब राजा अजीत सिंह ने भारी भरकम सेना से लड़ने से इंकार कर दिया था.
अली बहादुर उस वक्त काफी वीर शासक था और उसने पूरे बुंदेलखंड पर कब्जा जमाया था. रीवा के राजा उसको इतनी तवज्जों नहीं देते थे. तब उसने अपनी धौंस जमाने को लेकर रीवा राज्य से टैक्स की मांग की. जिसके बाद रीवा के महाराजा ने टैक्स देने से मना कर दिया. ये सुनकर वो आगबबूला हो गया और उसने अपनी दस हजार की सेना के साथ तोप, हाथी, घोड़ा और पूरे लाव-लश्कर को रीवा राज्य में भेज दिया.
युद्ध लड़ने मैदान में आई महारानी
जब रीवा में मराठों के सेनापति यशवंत राव नायक के आने की खबर मिली तो महाराजा अजीत सिंह ने सरदारों को बुलाया और उन्हें बताया कि मराठों की विशाल फौज आई है क्या किया जाए? जिसके बाद सर्वसम्मति से लड़ने से इंकार कर दिया गया, क्योंकि रीवा में ज्यादा सेना नहीं थी, वहां कुल 200 सैनिक ही थे.
जब यह बात चन्देलिन महारानी कुंदन कुंवारी को पता लगा तो वो आग बबूला हो गईं और उन्होंने खुद जंग लड़ने की बात कही. उस वक्त उन्होंने अपनी सेविका मुनिया से कहा था कि युद्ध की तैयारी करो हमें युद्ध लड़ना है. इतना कहते हुए उन्होंने एक थाल भेजा जिसमे पान, तलवार और कई चीजें थीं. उन्होंने कहा कि अगर आप लोगों को जंग लड़ना है तो पान लीजिये और तलवारे उठाये नहीं तो मैं जा रही हूं युद्ध लड़ने. महारानी का साहस व जोश देखकर रीवा के सैनिकों में युद्ध का जुनून आ गया और उन्होंने कहा कि हम युद्ध लड़ेंगे.
जब मराठों की पूरी सेना में मचा कोहराम
महारानी द्वारा जंग के ऐलान के बाद चोरहटा में भीषण युद्ध शुरू हो गया जो नैकहाई के युद्ध के नाम से जाना जाता है. रीवा के छापामार सैनिकों ने ग्रुप बनाकर मराठों की सेना को घेर लिया था. जिससे मराठों के सेनापति यशवंत राव नायक को लगा कि हम चारों तरफ से घिर गए हैं. यशवंत राव नायक इतना खतरनाक था कि उसके बारे में कहा जाता था कि अगर वो हाथी से उतर कर अपनी घोड़ी पर बैठ गया तब वो घनघोर लड़ाई लड़ता था.
जैसे ही यशवंत राव नायक हाथी से उतरकर घोड़ी पर बैठने वाला था खाजा के प्रताप सिंह बघेल ने उसको भाला मार दिया. जिसके बाद वो घोड़ी से गिर गया और मराठों की पूरी सेना में कोहराम मच गया. सेनापति के गिरते ही सैनिक अमर सिंह ने तलवार से वार कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. जिसके बाद मराठों की पूरी सेना में भगदड़ मच गई. इसके बाद रीवा के योद्धाओं ने घनघोर युद्ध लड़ी, इस युद्ध में रीवा राज्य के भी तीस सैनिक शहीद हुए थे.
सेनापति का सिर और शरीर अलग-अलग जगह गाढ़ा
सेनापति का सिर काटने के बाद अमर सिंह ने भाले में छेद कर उसको रीवा महाराजा को पेश किया था. मराठा सेनापति का सिर किले के घरियारी दरवाजा जो उपरहटी की तरफ है वंहा पर गाढ़ा गया था. और धड़ जंहा पर रीवा राज्य के शहीद हुए वीर सैनिकों की छतरी बनी हुई है वंहा पर गाढ़ा गया था. यहां मराठों के सेनापति की भी छतरी बनाई गई है. रीवा राज्य के वीर योद्धाओं के साथ ही मराठा सेनापति की भी छोटी छतरी बनाई गई थी. जिससे उसको भी सम्मान मिल सके मराठा सेनापति की छतरी का आधा हिस्सा अब गिर चुका है.
रीवा राज्य में हुए इस नैकहाई के युद्ध में करीब तीस सैनिक शहीद हुए थे. जिनमे पंचम सिंह के साथ ही भग्गा खान साहनी और निहाल खान साहनी जो सगे भाई थे वो भी शामिल थे. इनके परिवार वालों को इन पर फख्र है और आज भी उस युद्ध का जिक्र आने पर उनकी याद ताजा हो जाती है. रीवा के भग्गा खान और निहाल खान के परिवार के पास आज भी वो तलवार मौजूद है जिससे उनके पुरखों ने युद्ध लड़ा था.