एमवायएच और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में हृदय और हड्डी से संबंधित 25 से ज्यादा ऑपरेशन अटक गए हैं। इन सर्जरी के लिए जरूरी इंप्लांट(स्टेन, रॉड, प्लेट, स्क्रू व अन्य) कम मिल पा रहे हैं। यहां तक कि डायलिसिस के किट का स्टॉक भी कम ही बचा है। सबसे गंभीर स्थिति उन मरीजों की है जिनका आयुष्मान कार्ड है। इन मरीजों को 10-15 दिन भर्ती रखने के बाद वापस लौटाया जा रहा है। एमवायएच में रोज 2000 मरीजों के ओपीडी है। यह मप्र मेडिकल कॉर्पोरेशन की सप्लाई चेन टूटने के कारण हुआ है। हाल ही में भोपाल में हुई वर्चुअल बैठक में मामला उठा था कि अस्पतालों को जो बजट आवंटित किया गया, वह जरूरत से काफी कम है। एमवायएच ने करीब 80 करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन पैसा उसके मुकाबले काफी कम मिला है। एमवाय और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के सर्जनों ने अंदेशा जताया है कि अगर जल्द स्थिति नहीं सुधरी तो ऑपरेशन बंद करने पड़ सकते हैं। सर्जिकल धागे खराब, दो बार लगाने पड़ रहे टांके
सूत्रों का कहना है कि अभी में जो सर्जिकल धागे (सूचर्स) मिल रहे हैं, उनकी गुणवत्ता खराब है। सर्जनों को एक ही जगह दो बार टांके लगाने पड़ रहे हैं। इससे न केवल ऑपरेशन का समय बढ़ रहा है। कार्डियक जैसी संवेदनशील सर्जरी में संक्रमण का जोखिम भी बढ़ गया है। सीधे ऑपरेशन से जुड़ी चीजों की कमी
ECG इलेक्ट्रोड : सर्जरी के दौरान दिल की धड़कन मॉनिटर करने के लिए लगाए जाते हैं। इनके बिना जनरल एनेस्थीसिया देना मुश्किल।
सोडा लाइम : इसका उपयोग ऑपरेशन के दौरान मरीज की सांस से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को फिल्टर करने में होता है। इसके बिना एनेस्थीसिया मशीन ठीक से काम नहीं कर पाती।
स्टिच (टांके), कैनुला (खून के प्रवाह को नियंत्रित करने वाली ट्यूब), शंट, ऑक्टोपस और ब्लोअर जैसे उपकरण भी कम पड़ रहे हैं, जो ऑपरेशन के दौरान हार्ट को स्थिर रखने और प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए जरूरी।
ऑर्थोपेडिक सर्जरी में लगने वाले इंप्लांट भी कम। ये टूटी हड्डी जोड़ने के काम आते हैं।
सर्जरी में रोज इस्तेमाल होने वाले ट्यूब, स्टेपलर और सूचर की भी कमी है। ये सभी डिस्पोजेबल आइटम होते हैं। यह आ रही समस्या
मार्च से बजट रिन्यूअल और टेंडर की प्रक्रिया अटकी है। बुधवार को एमजीएम मेडिकल कॉलेज में टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन इंटरनेट कनेक्टिविटी गड़बड़ा गई।
कॉर्पोरेशन से सप्लाई नहीं मिलने के कारण अस्पतालों को ‘लोकल परचेस’ करनी पड़ रही है। इससे बजट बिगड़ रहा है। भारी ओपीडी लोड के कारण लोकल स्टॉक भी खत्म हो रहा है।
डायलिसिस भी अगले 3-4 दिनों में प्रभावित हो सकते हैं। डायलिसिस किट्स का स्टॉक कम है। सीधी बात – -डॉ. अरविंद घनघोरिया, डीन, एमजीएम कॉलेज सवाल: ऑर्थोपेडिक और कार्डियक इंप्लांट्स के लिए मरीज कब तक भटकेंगे?
इंप्लांट्स के टेंडर पूरे हो चुके हैं। एक महीने में प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। तब तक पुराने टेंडर से ही अस्थायी आपूर्ति की अनुमति दे दी गई है।
सवाल: क्या बजट कम मिला है?
शासन ने सभी बड़े मेडिकल कॉलेजों को समान बजट आवंटित किया है। हमने मार्च में ही 3 महीने का बैकअप स्टॉक ले लिया था। जैसे-जैसे जरूरत बढ़ेगी, बजट की मांग की जाएगी।
सवाल: नए टेंडर प्रक्रिया में इतना समय क्यों लग रहा है?
प्रक्रिया में 3-4 महीने लगते हैं। उम्मीद है कि अगले कुछ माह में पूरी व्यवस्था सुचारू हो जाए।
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