भिंड में फर्जी तरीके से हथियारों के लाइसेंस 3 लाख रुपए में बनते रहे। इस मामले में पिछले दिनों आर्म्स शाखा के दो कर्मचारियों समेत 14 लोगों को जेल भेजा गया। चपरासी दलालों से फर्जी दस्तावेज लाता और क्लर्क एडीएम से साइन करवाकर लाइसेंस बनवा देतीं। हथियार खरीदने और लाइसेंस बनवाने का ठेका 10 सालों से चल रहा था। पुलिस को जिले में करीब 350 हथियारों के लाइसेंस फर्जी तरीके से बनवाने का संदेह है। जांच में सच निकला तो यह मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा शस्त्र लाइसेंस घोटाला होगा। दैनिक भास्कर ने मामले को समझा और इसमें दालालों से लेकर विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका जानी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… कैसे हुआ फर्जी आर्म्स लाइसेंस रैकेट का खुलासा तारीख : 23 अप्रैल 2026। पुलिस ने जिले में संगठित फर्जी आर्म्स लाइसेंस रैकेट का खुलासा किया। बताया गया कि कुछ समय पहले डीआईजी और भिंड एसपी डॉ. असित यादव के निर्देश पर साइबर टीम ने ‘नेटग्रिड’ से जांच की थी। इसमें कुछ लाइसेंसों की पोर्टल पर जांच की गई तो उनका कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इससे स्पष्ट हुआ कि कलेक्ट्रेट की आर्म्स शाखा से ही पूरा फर्जीवाड़ा संचालित किया जा रहा था। यह गिरोह पैन कार्ड, आधार कार्ड और फोटो जैसे दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर ऑनलाइन फर्जी लाइसेंस तैयार करता था। इन लाइसेंसों पर क्यूआर कोड और जिला अधिकारी भिंड का नाम अंकित होता था, ताकि किसी को शक न हो। जांच आगे बढ़ी तो आर्म्स शाखा की क्लर्क मधुवाला मौर्य और रामसेवक कोरकू समेत एमपी, यूपी और महाराष्ट्र के 14 आरोपियों के नाम आए। उन्हें पकड़कर जेल भेजा गया। आरोपियों के पास से 10 पिस्टल और 315 बोर राइफल जब्त किए गए। अब पढ़िए किस किरदार की क्या भूमिका इन 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया रोहित चांडोले (नासिक), प्रवीण भावरे (नासिक), सतीश चंद्र (नासिक), सतीश त्रिपाठी (टोला रावतपुरा, भिंड), पुष्पेंद्र राजावत (भिंड), अवरार खान (भिंड), रामसेवक कोरकू (भृत्य, कलेक्ट्रेट कार्यालय), मधुबाला मौर्य (आर्म्स शाखा, भिंड), अजीत कुशवाह (भिंड), सुमेर यादव (उमरी), राधाचरण नायक (सरावन, जिला जालौन, यूपी), राहुल पाटिल (नासिक), प्रांशु शर्मा (लहार) और सुनील शर्मा (लहार)। 10 साल में इस तरह हुआ फर्जीवाड़ा लाइसेंस रिन्यू कराने के नाम पर घोटाला फर्जी हथियार लाइसेंस का मामला 2016-17 से शुरू हुआ। पहले लाइसेंस के रिन्यू और फौती लाइसेंस के चालान में गड़बड़ी की जाती थी। तत्कालीन कलेक्टर इलैयाराजा टी ने बाहर से लिए शस्त्र लाइसेंस को भिंड में वैध करने पर जोर दिया। उन्होंने आदेश दिया कि आर्मी मैन, जिन्होंने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू में सेवा के दौरान शस्त्र लाइसेंस लिए हैं, उन्हें भिंड में रखने के लिए संबंधित स्टेट व मुख्यालय से एनओसी ली जाए। सभी नियम फॉलो करने के निर्देश दिए गए। यहीं से विभाग के बाबू और क्लर्क को फर्जी लाइसेंस बनाने का आइडिया आया। दलाल एक्टिव हुए। उन्होंने दूसरे स्टेट से शस्त्र लाइसेंस की पावती और फर्जी एनओसी तैयार कराना शुरू किया। इस समय बंदूक लाइसेंस का रेट 2 से ढाई लाख रुपए था। पिस्टल लाइसेंस का रेट 3 से 4 लाख था। इन दिनों आर्म्स शाखा के प्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया थे। एक्सपर्ट के तौर पर दलाल सतीश त्रिपाठी थे। यह खेल 2022 तक चलता रहा। इसी बीच क्लर्क महेंद्र भदौरिया बीमार हुए। कामकाज सतीश त्रिपाठी संभालता रहा। उनके निधन के बाद आर्म्स शाखा में क्लर्क के पद पर संजीव जैन, राधामोहन श्रीवास और चेतन सिंह रहे। जांच में सामने आया कि इस समय भी फर्जी लाइसेंस बनते रहे। साल 2024 में मधुवाला मौर्य क्लर्क के रूप में तैनात हुईं। तीन-चार महीने तक कुछ नहीं हुआ। इसके बाद वे भी फर्जी लाइसेंस के खेल में शामिल हो गईं। आरोप सिद्ध होने पर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। पुलिस मुख्यालय से लेनी होती है स्वीकृति विभाग के अनुसार शस्त्र लाइसेंस स्थानांतरण की एक वैधानिक प्रक्रिया है। जैसे किसी व्यक्ति ने पंजाब, हरियाणा या जम्मू से शस्त्र लाइसेंस बनवाया है। वह भिंड का निवासी है तो पहले शस्त्र शाखा में बंदूक को गृह जिले में दर्ज कराने का आवेदन करेगा। इस पर भिंड की शस्त्र शाखा से संबंधित जिले के कलेक्टर को पत्र लिखा जाता है। जिस जिले से लाइसेंस बना है, वहां का कलेक्टर एनओसी जारी करता है। इसके बाद दूसरा पत्र भिंड के पुलिस अधीक्षक कार्यालय को भेजा जाता है। पुलिस से एनओसी आने पर शस्त्र शाखा प्रभारी वैधानिक दस्तावेजों का निरीक्षण करते हैं। इसके बाद लाइसेंस दर्ज करने की कार्रवाई होती है। इसके बाद प्रक्रिया ऑनलाइन की जाती है। पिस्टल या रिवाल्वर लाइसेंस के लिए भोपाल पुलिस मुख्यालय से स्वीकृति लेनी होती है। तब गृह जिले में लाइसेंस दर्ज होता है। ऐसे किया जाता था फर्जीवाड़ा शुरुआत में दलाल दूसरे जिले की आर्म्स लाइसेंस पावती तैयार कराकर आवेदन करवाते थे। इसके बाद एनओसी का फर्जी पत्र बनवाते। गृह जिले में पुलिस वैरीफिकेशन के बाद लाइसेंस को वैध दिखाते थे। जबकि उनके पास पहले कोई लाइसेंस नहीं होता था। इसके बाद प्रभारी की स्वीकृति पर लाइसेंस दर्ज कर लिया जाता था। लेकिन पिछले तीन-चार साल से दलाल लाइसेंस और हथियार दोनों का ठेका लेने लगे। वेरिफिकेशन से बचने गलत लाइसेंस नंबर डाले पुलिस वैरीफिकेशन से बचने के लिए गिरोह ने नया तरीका अपनाया। उन्होंने 8-10 साल पुराना लाइसेंस बताया। पुराने रिकॉर्ड रजिस्टर में पहले से लाइसेंस नंबर दर्ज कर लिया जाता था। फिर आवेदक के नाम से आवेदन तैयार होता था, जिसमें 8-10 साल पुराना लाइसेंस दिखाया जाता था। लाइसेंस नंबर भी आवेदन में दिया जाता था। इसका सरकारी चालान बनवाया जाता था। आवेदन एडीएम के सामने प्रस्तुत किया जाता था। फिर पुराने लाइसेंस के आधार पर डुप्लीकेट लाइसेंस की स्वीकृति ली जाती थी। इस प्रक्रिया में अपराधियों को भी फर्जी लाइसेंस दिए जाने लगे। ये लाइसेंस भिंड के अलावा महाराष्ट्र और दिल्ली तक दिए गए। अपराधियों के भी बनाए लाइसेंस फर्जी लाइसेंस का खेल शुरुआत में फर्जी पावती और एनओसी पर चलता रहा। महेंद्र भदौरिया और दलाल सतीश त्रिपाठी के समय पुलिस रिकॉर्ड भी देखा जाता था। उन्हें डर था कि अगर अपराधी को लाइसेंस दिया गया तो पकड़े जाएंगे। इसलिए वे सतर्क रहते थे। लेकिन 2023 के बाद सतीश त्रिपाठी की पकड़ कमजोर हुई। दूसरे दलाल सक्रिय हो गए। उन्होंने फर्जी लाइसेंस का पूरा ठेका लेना शुरू किया। बंदूक और पिस्टल दोनों हथियार देने का सौदा होने लगा। वे हथियार लखना, यूपी से खरीदवाते थे। लाइसेंस को वैध बताकर देते थे। वर्तमान में लाइसेंस बनवाने की रकम 4 से 6 लाख तक ली जाती थी।
Source link