मध्य प्रदेश की सियासत इन दिनों विकास के दावों से ज्यादा नेताओं की ‘बदजुबानी’ को लेकर चर्चा में है। गाली-गलौज, अधिकारियों को धमकाना और महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करना राजनीति का न्यू ‘नॉर्मल’ बन गया है। आलम यह है कि सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देना पड़ा और राज्य के एक कद्दावर मंत्री के लिए कहा कि-“इन्हें विवादित बयान देने की आदत हो गई है।” पिछले चार महीनों में सत्ता और विपक्ष के नेताओं ने कैसे मर्यादा की सीमाएं लांघीं और पार्टियां कार्रवाई के बजाय क्यों ‘मौन’ साधे बैठी हैं। पढ़िए रिपोर्ट…. 5 प्रमुख मामले, जब ‘माननीयों’ ने मर्यादा खोई मंत्री विजय शाह: सुप्रीम कोर्ट की फटकार
मई 2025 में मंत्री कुंवर विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी की। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा, “बस बहुत हुआ, अब हमारे आदेश का पालन कीजिए।” कोर्ट ने शाह को ‘आदतन’ विवादित बयान देने वाला बताया। हालांकि उन्होंने माफी मांगी, लेकिन अब तक उन पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। “एक फूंक मारेंगे तो पाकिस्तान गिरोगे”
भिंड के लहार से भाजपा विधायक अंबरीश गुड्डू शर्मा ने अपनी ही सरकार के अधिकारियों को धमकी दी। उन्होंने कहा कि उनकी एक फूंक से अधिकारी पाकिस्तान जा गिरेंगे। इससे पहले वे विरोधियों के लिए ‘कुत्ते’ और ‘कुकुरमुत्ते’ जैसे शब्द इस्तेमाल कर चुके हैं। “नशे में पीएचडी हूं”
पिछोर विधायक प्रीतम लोधी के बेटे ने अपनी थार गाड़ी से 5 लोगों को टक्कर मारी। पुलिसिया कार्रवाई से भड़के विधायक ने एसडीओपी के बंगले को गोबर से भरने की धमकी दी। लोधी ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि वे “नशे में पीएचडी” हैं। पार्टी ने उन्हें भोपाल बुलाकर सिर्फ ‘हिदायत’ देकर छोड़ दिया। “दांत तोड़कर जमीन में गाड़ दूंगा”
आलीराजपुर में बीजेपी नेता इंद्र सिंह चौहान ने एक महिला अधिकारी को दांत तोड़ने और जमीन में गाड़ने की धमकी दी। अधिकारी ने नियमों के विरुद्ध अपात्र लोगों को कन्यादान योजना का लाभ देने से मना किया था। इंद्र सिंह चौहान, मप्र सरकार के कैबिनेट मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई हैं। महिलाओं पर शर्मनाक टिप्पणी
कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया ने विधानसभा के विशेष सत्र में महिलाओं को ‘पैरों की जूती’ बता दिया। इससे पहले उन्होंने दलित-ओबीसी महिलाओं और रेप को लेकर ऐसी ‘थ्योरी’ दी थी, जिसे सुनकर समाज का सिर शर्म से झुक जाए। अफसरों और नेताओं के बीच बढ़ता ‘कोल्ड वॉर’
नेताओं की बदजुबानी का सबसे ज्यादा असर प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। ज्यादातर नेताओं ने अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर विवादित बयान दिए हैं। मंत्री राकेश सिंह पर एक आईएएस अधिकारी को जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा। भिंड विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह कलेक्टर पर हाथ तक उठा चुके हैं। वहीं मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मौतों जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सवाल पूछने पर ‘घंटा’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। बढ़ते टकराव के बीच 4 मई को केंद्र सरकार के DoPT ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को पत्र लिखकर याद दिलाया कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद का एक प्रोटोकॉल होता है, जिसका पालन जरूरी है। रिटायर्ड आईएएस बोलीं- नेताओं की ट्रेनिंग हो
रिटायर्ड आईएएस वीणा घाणेकर कहती हैं कि अधिकारी शिक्षित और प्रशिक्षित होते हैं। वे नियमों से बंधे हैं। दूसरी ओर, जनप्रतिनिधि सीधे जनता के दबाव में होते हैं। जरूरी नहीं कि हर नेता प्रशासनिक सीमाएं समझे। जैसे अफसरों की ट्रेनिंग होती है, वैसे ही नेताओं के लिए ‘प्रशासनिक मर्यादा और संवाद’ का प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए। एक्सपर्ट बोले- ये सब वोट बैंक की मजबूरी
वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह कहते हैं कि आज की राजनीति का एकमात्र लक्ष्य ‘चुनाव जीतना’ रह गया है। अगर कोई नेता विवादित बयान देकर वोट बैंक साध रहा है या अपनी जाति/क्षेत्र में प्रभाव रखता है, तो पार्टियां उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई से बचती हैं। नेताओं का असली इम्तिहान चुनाव में होता है, लेकिन तब तक वे व्यवस्था को काफी नुकसान पहुँचा चुके होते हैं। पार्टियों का पक्ष: बचाव या सुधार?
बीजेपी के प्रवक्ता कल्पेश ठाकुर कहते हैं कि उनका संगठन नैतिक जिम्मेदारी समझता है। इसलिए मंडल और जिला स्तर पर ‘प्रशिक्षण शिविर’ लगाए जा रहे हैं, ताकि कार्यकर्ताओं के व्यवहार में शालीनता और एकरूपता आए। वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता अवनीश बुंदेला का कहना है कि कांग्रेस हमेशा संतुलित और जिम्मेदार बयानों का समर्थन करती है। उनकी नीति किसी की भावनाएं आहत करने की नहीं है और पार्टी वंचितों को न्याय दिलाने की विचारधारा पर चलती है।
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