उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का कुख्यात हत्यारा विकास दुबे (Vikas Dubey) मध्य प्रदेश के उज्जैन (Ujjain) से कानपुर (Kanpur) ले जाते वक़्त पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. उसके उज्जैन आने और जाने से लेकर दर्ज़नों ऐसे सवाल हैं,जो उसके ख़ात्मे के साथ ही दफ़न हो गए. कल सुबह जब वो उज्जैन के महाकाल मंदिर (Mahakal Mandir) में दिखा और उसके बाद से जो सवालों की झड़ी लगी तो आज सुबह उसके मारे जाने तक लगी रही. वैसे जिस नाटकीय तरीके से विकास दुबे एमपी में दाखिल हुआ, सबसे ज्यादा सुरक्षा वाले एमपी के महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए गया और जैसे पकड़ाया उसने तो सवालों की फेहरिश्त तैयार कर दी. सबसे बड़ा सवाल ये कि जिस दुर्दांत अपराधी को कई राज्यों की पुलिस तलाश रही थी,वो बेख़ौफ़ होकर सड़क के रास्ते फरीदाबाद से 4 राज्यों की सीमाएं पार करते हुए कैसे एमपी में पहुँच गया.
राजस्थान के धौलपुर, एमपी के मुरैना, यूपी के झांसी की सीमाओं पर तो आम दिनों में भी चैकिंग होती है. चैकिंग न भी हो तो चेक पोस्ट पर पुलिस तो रहती ही हैं. ग्वालियर में कोरोना के कारण यूं भी लोकल लोगों की चेकिंग हो रही है, फिर भी वो आसानी से आ गया. आने के बाद भोपाल होता हुआ उज्जैन भी पहुंच गया (यदि उसने यही रूट लिया है तो) आने के बाद दिलेरी से क्षिप्रा में स्नान करने के बाद बिना मास्क लगाए फूल वाले से फूल खरीदकर दर्शन की प्रक्रिया समझता है. (जैसी कहानी पुलिस ने तैयार की है उसके मुताबिक़) एंट्री का वीआइपी टिकिट लेता है शुभम के नाम से. एंट्री के वक़्त जो आईडी दिखाता है,वो नकली, उम्र भी ग़लत. उसके बाद पुलिस के आला अधिकारियों को बिना हिचके गोलियों से भून डालने वाला एक निजी सुरक्षा एजेंसी के निहत्थे गार्ड से काबू में आ जाता है. ये घोर अविश्सनीय कहानी है. उसके बाद का ड्रामा भी देखिए कि उसे काबू करने जो पुलिस के जवान आए, वे भी निहत्थे. उनमें कोई सुपर कॉप नहीं, तोंद बढ़ाए हुए हेड कांस्टेबल स्तर के लोग उसे खींचते हुए ले जाकर पुलिस की गाड़ी में बैठा देते हैं और एक हलकी सी चपत भी उसके सर में लगा देते हैं.
अब सवाल तो उठेंगे ही…..!
अब उसके बाद की कहानी महाकाल मंदिर में दर्शन से पहले जूतों के साथ अपने साथ लाया गया सामान रखने के लिए लॉकर भी है. उसमें वो अपना बैग रखता है. कथित तौर पर पुलिस को उसमें से एक चाक़ू मिलता है. इतना बड़ा अपराधी, खूंखार हत्यारा चाक़ू के साथ पकड़ा जाता है और पुलिस आर्म्स एक्ट के तहत कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं करती है. दिन भर की पूछताछ के बाद एमपी की पुलिस कोई एफआईआर दर्ज नहीं करती और सीधे किसी गुम हुए सामान की तरह एक पंचनामा बनाकर उत्तर प्रदेश की पुलिस को सौंप देती है. उत्तर प्रदेश से हथियारबंद ढेरों पुलिस वाले आते हैं चार गाड़ियों में. ये जानते हुए कि वो कितना खूंखार अपराधी है. देर शाम उसे बाय रोड उज्जैन से लेकर रवाना होते हैं. ऐसा लगता है कि इस एनकाउंटर की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी. बाद में जो भी हुआ वो सिर्फ इसका फिल्मांकन ही हुआ.
एमपी में कोर्ट को बीच में न लाने के पीछे एक सबसे बड़ा कारण ये है कि यदि उज्जैन में FIR होती, तो उसे कोर्ट में पेश करना पड़ता. फिर उत्तर प्रदेश की पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर साथ ले जाती. यानी उसके बाद विकास कोर्ट की जागीर हो जाता, जो पुलिस को सौंपा गया होता. ज़ाहिर है कि ऐसे में उसके बाद होने वाली किसी भी अनहोनी के लिए कोर्ट पुलिस से सवाल-जवाब भी करती. उत्तर प्रदेश की पुलिस के लिए फिर उसे यूं मार देना मुश्किल हो जाता. यही एक तथ्य है जो सवाल खड़े करता है. बहरहाल, यहां से ले जाने में एमपी की सीमा तक एमपी की पुलिस ने सुरक्षा के साथ उसे छोड़ा ताकि सनद रहे कि हमने तो सकुशल भेजा था अब आगे जो भी हुआ वो यूपी की पुलिस के माथे पर.
कुल मिलाकर सारा घटनाक्रम खुद बता रहा है कि विकास को जो स्क्रिप्ट सरेंडर की पढ़कर सुनाई गई थी,वो शायद कुछ और थी, जिसके झांसे में वो आ गया और बाद में क्लायमेक्स में डायरेक्टर ने थोड़ा फ़ेरबदल कर दिया. अब कुछ दिनों तक हल्ला मचेगा, कुछ मानवाधिकार संगठन खतो-किताबत करेंगे, फिर मामला ठंडा पड़ जाएगा. विकास बेशक मौत का हक़दार था लेकिन उससे पूछा तो जाना ही चाहिए था कि उसके मददगार कौन लोग थे, क्या-क्या राज उसके अंदर दफ़न हैं.? खैर, आतंक के पर्याय का अंत अमूमन ऐसे ही होता है, लेकिन फिर भी ये मामला सियासत में गर्माएगा, इसकी गारंटी पूरी है.
लेखक प्रवीण दुबे न्यूज 18 मध्य प्रदेश के एडिटर हैं.