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18 घंटे पहलेलेखक: जयदेव सिंह/राजकिशोर यादव
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भारत-इंग्लैंड टेस्ट सीरीज में दोनों टीमों की जीत-हार और उनके खेल से ज्यादा पिच की चर्चा रही। पहले टेस्ट में जीत के बाद अंग्रेजों को अगले तीन मैच में टर्निंग ट्रैक पर हार मिली। आखिरी टेस्ट में भी इंग्लैंड के बल्लेबाज भारतीय स्पिनर्स का सामना नहीं कर सके और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। दूसरे टेस्ट में हार के साथ ही पूर्व इंग्लिश प्लेयर्स पिच पर सवाल उठाने लगे। वहीं, दूसरी ओर टीम इंडिया के खिलाड़ी कह रहे हैं कि जब हम न्यूजीलैंड या ऑस्ट्रेलिया में तीन दिन के अंदर हार जाते हैं, तब पिच खराब होने की चर्चा नहीं होती। जब पिच पेस बॉलर्स को सपोर्ट करती है, तब अगर पिच खराब नहीं होती तो स्पिन फ्रेंडली पिच को ही खराब क्यों बताया जाता है।
लेकिन, पिच बनती कैसे है? इसके नेचर में बदलाव कैसे आता है? और ट्रेडिशनल पिच से ड्रॉप इन पिच कितनी अलग होती है? आइये समझते हैं मध्य प्रदेश के पिच क्यूरेटर और BCCI का सर्टिफिकेशन कोर्स कर चुके शैलेश कुमार से…
सबसे पहले बात करते हैं पिच तैयार करने के तरीके की। पिच बनाने के लिए सबसे पहले मैदान के बीच में करीब 100 फीट लंबी और 10 फीट चौड़ी जगह चुनी जाती है। लंबाई हमेशा नॉर्थ-साउथ डायरेक्शन में ही रखी जाती है। जिससे सूरज की किरणें बल्लेबाज की आंखों में नहीं पड़े।
इसके बाद तय जगह पर करीब 13 इंच गहरा गड्ढा खोदा जाता है। इस गड्ढे में सबसे पहले ड्रेनेज का सिस्टम तैयार होता है। उसके लिए बाकायदा स्लोप तैयार करके पानी निकलने के लिए पाइप डाला जाता है। इससे बारिश होने पर पानी आसानी से निकल जाता है और पिच खराब नहीं होती।
इसके बाद पिच के तीन लेयर तैयार किए जाते हैं। पहली लेयर चार इंच की होती है। इसमें कोर सैंड (नदी की रेत) का इस्तेमाल होता है। इसके बाद 4 इंच की दूसरी लेयर डाली जाती है। इसमें 90% रेत के साथ 10% क्ले पाउडर का इस्तेमाल होता है। इस लेयर को लोमी लेयर कहते हैं। तीसरी और अंतिम लेयर 5 इंच की होती है। इसमें मिट्टी (लाल, काली या पीली मिट्टी) का इस्तेमाल होता है। इस मिट्टी को क्ले सॉयल कहते हैं।
जमीन के लेवल पर आने के बाद तीन इंच की एक्स्ट्रा लेयरिंग की जाती है। जमीन के लेवल पर आने के बाद पहले ग्रास लगाई जाती है। फिर हाइली क्ले मैटेरियल वाली मिट्टी एक-एक इंच कर डाली जाती है। और उसके साथ उसकी रोलिंग और वॉटरिंग भी की जाती है। इस तरह से हर पिच तैयार होती है। इसे कंस्ट्रक्शन पार्ट कहते हैं। ये एक बार होने वाला काम है।
मैच से पहले पिच पर डाले जाने वाला पानी और रोलिंग होती है सबसे अहम
अब आप कहेंगे कि जब हर पिच का कंस्ट्रक्शन एक तरह से होता है तो फिर उसका नेचर कैसे बदल जाता है। तो इसका जवाब है कि ये सब पिच के प्रिपरेशन पार्ट पर डिपेंड करता है। मैच से पहले पिच पर किए जाने वाले काम को प्रिपरेशन पार्ट कहते हैं।
जब भी कोई मैच होने वाला होता है। उससे 15 दिन से एक महीने पहले मैच के मुताबिक पिच का प्रिपरेशन किया जाता है। ये तैयारी मैच के फॉर्मेट यानी टेस्ट, वनडे, टी-20 के हिसाब होती है।
उदाहरण के लिए अगर टेस्ट के लिए पिच तैयार करनी है तो मैच से 15-20 दिन पहले से इस पर काम शुरू होता है। सबसे पहले पिच पर पानी डालने के बाद लाइटेस्ट रोलर से पिच पर रोलिंग होती है। जैसे-जैसे प्रॉसेस बढ़ता जाता है तो वाटरिंग का पैटर्न बदलता जाता है। साथ ही रोलर का वेट बढ़ता जाता है।
इसके बाद ग्रास लेवल पर काम होता है। ग्रास हरी रखनी है या नहीं उसके मुताबिक कटिंग होती है। इसे से पिच का नेचर तय होता है। इसी तरह वनडे और टी-20 में भी पिच की तैयारी की जाती है। इन मैचों में पिच पर ग्रास ना के बराबर ही छोड़ी जाती है। जिससे पिच बल्लेबाजों की मदद करे।
पिच में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी की भी तो बात होती है, उसका क्या?
पिच किस मिट्टी से बनी है इसे लेकर भी अक्सर बात होती है। टेस्ट मैचों में काली मिट्टी से बनी पिच को तेज गेंदबाजों और लाल मिट्टी से बनी पिच को स्पिनर्स के मददगार माना जाता है। काली मिट्टी में घूप लगने पर सिकुड़ती है और पानी डालने पर फैलती है। हालांकि, इन दोनों का नेचर पिच के प्रिपरेशन और वहां के मौसम के हिसाब से भी बदलता है। इसलिए एक ही मिट्टी से बनी अलग-अलग पिच का नेचर अलग होता है।
एक नई तरह की पिच ड्रॉप इन की भी तो बात हो रही है, उसका क्या?
ऐसी पिच जो क्रिकेट स्टेडियम के बाहर बनाई जाती है और सीजन शुरू होने पर उसे स्टेडियम में लाकर फिट किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में इस तरह की पिच का इस्तेमाल इंटरनेशनल मैचों में हो चुका है। दरअसल ऑस्ट्रेलिया के MCG, एडिलेड ओवल और पर्थ के स्टेडियम में क्रिक्रेट के अलावा फुटबॉल, रग्बी के मैच भी होते हैं। क्रिकेट सीजन खत्म होने के बाद यहां की पिच को निकालकर ग्रीनहाउस या किसी और ग्राउंड में ले जाकर रखा जाता है।
ड्रॉप इन पिच कैसे बनती है?
अब बात ड्रॉप इन पिच बनती कैसे है। इसको एक उदाहरण से समझते हैं। जैसे- MCG की पिच 24 मीटर लंबी, 3 मीटर चौड़ी और 20 सेंटीमीटर गहरी है। स्टील एक फ्रेम में बनी काली मिट्टी की इस पिच के ऊपर घास की परत है।
क्रिकेट का सीजन शुरू होने पर पिच को 30 टन के कस्टमाइज ट्रेलर से ग्राउंड पर लाया जाता है। इसके बाद उसे ग्राउंड पर बने सीमेंट के स्लैब के बीच में फिक्स कर दिया जाता है। सीजन खत्म होने के बाद पिच को उसी मशीन से इस स्लैब से बाहर निकालकर हटाया जाता है। सीमेंट स्लैब के गड्ढे को मिट्टी और आर्टीफिशयल टर्फ से पाट दिया जाता है।
चौथे टेस्ट से पहले इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने कुछ इस तरह से भारतीय पिचों का मजाक उड़ाया था।
बवाल करने वाले तो पिच खराब बता रहे हैं, तो एक आदर्श पिच कैसी होती है?
टेस्ट मैच में पहले दिन पिच में थोड़ी नमी होती है। पिच तेज गेंदबाजों को सपोर्ट करती है। खेल बढ़ने के साथ नमी कम होती जाती है वह बल्लेबाजों को सपोर्ट करने लगती है। दूसरे दिन के तीसरे सेशन से पिच स्पिनरों को सपोर्ट करती है। चौथे और पांचवें दिन पिच बल्लेबाजी के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल होती है। टेस्ट के लिए एक बेहतरीन पिच उसे माना जाता है जिस पिच पर टेस्ट मैच का नतीजा आए।