किसानों की बढ़ी टेंशन! सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक और इलिया का डबल अटैक, हजारों एकड़ बर्बादी की कगार पर

किसानों की बढ़ी टेंशन! सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक और इलिया का डबल अटैक, हजारों एकड़ बर्बादी की कगार पर


खंडवा. बारिश में देरी और लगातार बढ़ रही उमस ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. खंडवा सहित पूरे निमाड़ अंचल में इस बार सोयाबीन की फसल पर पीला मोजेक वायरस और इलिया कीट का प्रकोप तेजी से फैलता जा रहा है. फसल का रंग पीला पड़ने लगा है और पत्तियाँ मुरझा रही हैं. इससे हजारों एकड़ में बोई गई फसल पर खतरा मंडराने लगा है.किसानों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि खेतों में खड़ी फसल अब बर्बाद होने की कगार पर पहुंच रही है. सोयाबीन जो किसानों की मुख्य नकदी फसल मानी जाती है, उसमें अब वायरस जनित बीमारियों ने पैर पसार लिए हैं.कृषि विशेषज्ञ सुनील पटेल, जो खंडवा में ”जय किसान कृषि क्लीनिक” चलाते हैं, उन्होंने इस मामले में अहम जानकारी साझा की है.

क्या कहता है कृषि एक्सपर्ट?
कृषि सलाहकार सुनील पटेल के अनुसार”इस समय किसानों को सबसे ज्यादा दिक्कत पीला मोजेक वायरस से हो रही है. यह बीमारी खासतौर पर उमस और सफेद मक्खी (whitefly) के कारण तेजी से फैलती है. जैसे ही फसल पर सफेद मच्छर का असर बढ़ता है, वायरस तेजी से फैलता है और पौधे पीले पड़ने लगते हैं.”

उन्होंने बताया कि खंडवा जिले में करीब सत्तर से अस्सी हजार हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती की जाती है. वर्तमान में करीब दस से बीस प्रतिशत खेतों में पीला मोजेक का असर देखा जा रहा है, लेकिन यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका प्रभाव और तेज़ी से फैल सकता है.

बचाव का उपाय क्या है?
सुनील पटेल किसानों को सलाह देते हैं कि इस बीमारी को रोकने के लिए सबसे पहले सफेद मच्छर पर नियंत्रण जरूरी है. इसके लिए किसान ”एसिटामिप्रिड 20% डब्ल्यूएसपी” नामक कीटनाशक का उपयोग करें. इसे 10 ग्राम प्रति पंप के हिसाब से छिड़काव करें.”

इसके साथ ही वह एक फफूंदनाशक (Fungicide) भी मिलाकर छिड़काव करने की सलाह देते हैं-प्रोपिकोनाजोल नाम की दवा को 50 ग्राम प्रति पंप के हिसाब से एसिटामिप्रिड के साथ मिलाकर स्प्रे करें. इस मिश्रण का छिड़काव करने से फसल को पीला मोजेक और इलिया दोनों से काफी हद तक बचाया जा सकता है.”

किसानों की प्रतिक्रिया
पूरे जिले के कई किसानों का कहना है कि उनकी सोयाबीन की फसल कुछ ही दिनों में पीली पड़ने लगी है. पहले उन्होंने इसे सामान्य माना, लेकिन जब पत्तियां झड़ने लगीं और फसल मुरझाने लगी, तब चिंता बढ़ गई. कई किसान स्थानीय कृषि केंद्रों से दवाइयां ले चुके हैं, जबकि कुछ अभी भी जानकारी के अभाव में इंतजार कर रहे हैं.

प्रशासन से क्या मांग?
किसानों की मांग है कि कृषि विभाग इस समस्या को गंभीरता से ले और हर गांव में जाकर निरीक्षण करे. साथ ही किसानों को फ्री या सब्सिडी पर दवाइयां उपलब्ध कराई जाएं, ताकि फसल को बचाया जा सके. यदि समय रहते कदम नहीं उठाया गया तो निमाड़ क्षेत्र को इस बार भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

सोयाबीन किसानों के लिए यह समय सतर्क रहने का है. सही जानकारी, समय पर दवा और उचित देखभाल से फसल को बीमारी से बचाया जा सकता है. कृषि विभाग और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि किसानों के बीच जागरूकता फैलाएं और उन्हें तकनीकी सहायता दें.



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